देश की विभिन्न मंडियों में 9 अगस्त को क्या रहे फलों और फसलों के भाव?

Todays Mandi Rates

देश के विभिन्न शहरों में फलों और फसलों की कीमतें क्या हैं?

मंडी

कमोडिटी

न्यूनतम मूल्य (किलोग्राम में)

अधिकतम मूल्य (किलोग्राम में)

रतलाम

अदरक

28

32

रतलाम

आलू

18

20

रतलाम

टमाटर

22

24

रतलाम

हरी मिर्च

48

52

रतलाम

पत्ता गोभी

25

30

रतलाम

भिन्डी

22

25

रतलाम

नींबू

30

35

रतलाम

फूलगोभी

28

35

रतलाम

बैंगन

13

16

रतलाम

करेला

40

45

रतलाम

कटहल

18

20

रतलाम

पपीता

28

30

रतलाम

शिमला मिर्च

30

35

रतलाम

खीरा

14

16

रतलाम

केला

35

36

रतलाम

अनार

45

55

रतलाम

सेब

80

82

लखनऊ

कद्दू

22

लखनऊ

पत्ता गोभी

25

30

लखनऊ

शिमला मिर्च

50

60

लखनऊ

हरी मिर्च

40

लखनऊ

भिन्डी

20

26

लखनऊ

नींबू

45

48

लखनऊ

खीरा

18

20

लखनऊ

गाजर

28

लखनऊ

मोसंबी

30

लखनऊ

केला

15

गुवाहाटी

प्याज

14

गुवाहाटी

प्याज

16

गुवाहाटी

प्याज

17

गुवाहाटी

प्याज

18

गुवाहाटी

प्याज

13

गुवाहाटी

प्याज

15

गुवाहाटी

प्याज

17

गुवाहाटी

प्याज

18

गुवाहाटी

प्याज

15

गुवाहाटी

प्याज

18

गुवाहाटी

प्याज

20

गुवाहाटी

प्याज

21

गुवाहाटी

लहसून

20

25

गुवाहाटी

लहसून

28

33

गुवाहाटी

लहसून

33

38

गुवाहाटी

लहसून

38

42

गुवाहाटी

लहसून

20

25

गुवाहाटी

लहसून

25

33

गुवाहाटी

लहसून

33

38

गुवाहाटी

लहसून

38

42

शाजापुर

प्याज

4

7

शाजापुर

प्याज

7

9

शाजापुर

प्याज

9

13

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सोयाबीन में तना मक्खी की पहचान एवं नियंत्रण के उपाय

तना मक्खी: तना मक्खी के मैगट पीले रंग के होते हैं, जो पत्तियों में छेद करके पौधे के अंदर घुस जाते हैं और पौधे के आंतरिक भागों को खाते हुए जड़ क्षेत्र की तरफ बढ़ते हैं।

  • संक्रमित पौधे का तना अंदर से लाल रंग का हो जाता है, साथ ही पौधे में टेढ़ी मेड़ी सुरंग दिखतीं हैं।

  • अत्यधिक संक्रमण की अवस्था में (प्रति पौधा 3 या अधिक मैगॉट) पौधे मुरझा कर मर जाते हैं।

  • अंडे से लट निकल कर मध्य शिरा से पत्ती के डंठल से होकर तने तक पहुँचती हैं।

नियंत्रण के उपाय

इसके नियंत्रण के लिए, लैमनोवा (लैम्ब्डा साइहेलोथ्रिन 4.9% सीएस) @ 120 मिली या नोवालक्सम (थियामेथोक्सम 12.60% + लैम्ब्डा-साइहलोथ्रिन 9.5% जेडसी) @ 50 मिली + सिलिको मैक्स @ 50 मिली, प्रति एकड़ 150 से 200 लीटर पानी के हिसाब से छिड़काव करें। 

जैविक नियंत्रण के लिए

जैविक नियंत्रण के लिए, बिग्रेड बी (बवेरिया बेसियाना  1.15% डब्ल्यूपी) @ 1 किग्रा + सिलिको मैक्स @ 50 मिली, प्रति एकड़ 150 से 200 लीटर पानी के हिसाब से छिड़काव करें।

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कपास में फूल पूड़ियाँ गिरने के कारण एवं रोकथाम के उपाय

कपास में फूल पूड़ियाँ गिरने से पैदावार में भारी गिरावट आती है। इसके कारण निम्न है – 

  • परागण की कमी :- विभिन्न तंत्रों के कारण परागण विफल हो सकता है तथा परागण की कमी, पराग कर्ता की कमी या विपरीत पर्यावरण के कारण परागण में कमी आ सकती है।

  • पोषक तत्वों की कमी :- कई बार सही मात्रा में पौधे को पोषक तत्व नहीं मिल पाते हैं, जिसके कारण फूल एवं फल पूर्ण विकसित नहीं हो पाते हैं और गिर जाते हैं। इसकी कमी की पूर्ति के लिए पौधे को गंधक, बोरॉन, कैल्शियम, मैग्नीशियम आदि तत्वों का मिलना बहुत जरूरी होता है

  • जल की कमी /नमी :- पर्याप्त जल की कमी के कारण पौधे पोषक तत्वों को भूमि से अपनी जड़ों के द्वारा अवशोषित नहीं कर पाते हैं, जिसके कारण फूलों की वृद्धि के लिए आवश्यक तत्वों की कमी हो जाती है और फूल और कली गिरने लगती हैं।

  • कीट तथा बीमारियां :- विभिन्न प्रकार के कीट एवं सूक्ष्म जीवों के पौधों में आक्रमण से फूल झड़ने लगते हैं। 

फल एवं फूलों के झड़ने से रोकने के उपाय:-

    • पोषक तत्वों का छिड़काव:- पौधों में समय-समय पर पोषक तत्वों का छिड़काव किया जाना चाहिए।  मुख्य एवं सूक्ष्म जैसे – बोरॉन, कैल्शियम, मैग्नीशियम आदि। 

    • सिंचाई:- आवश्यकता अनुसार एक निश्चित अंतराल से फसलों में सिंचाई करते रहना चाहिए जिससे पर्याप्त मात्रा में नमी बनी रहे, ध्यान रहे जरूरत से ज्यादा सिंचाई भी नुकसानदायक हो सकती है।

    • गुड़ाई:- कपास की फसल में समय-समय पर निराई व अन्य अंतर फसल का कार्य करते रहना चाहिए, ताकि खेत खरपतवारों से मुक्त रहे। गोबर की अच्छी पकी हुई खाद या केंचुआ खाद का इस्तेमाल समय समय पर करना जरूरी है |

    • कीट नियंत्रण:- फसलों  में कीट व बीमारी अधिक मात्रा में हानि पहुंचाते हैं। इसलिए समय पर देखरेख करें और कीट पर नियंत्रण करें। 

    • हार्मोन का संतुलन बनाए रखना:- सामान्य फसल में, हार्मोन के असंतुलन के कारण भी अधिक नुकसान होता है, तो हार्मोन का संतुलन बनाए रखें। इसमें नोवामैक्स (जिब्रेलिक एसिड 0.001%) @ 300 मिली प्रति एकड़, @ 150 से 200 लीटर पानी  के हिसाब से छिड़काव करें।

  • परागण कर्ता का उपयोग

इन फसलों के परागण के लिए मधुमक्खी या अन्य कीटों  का होना आवश्यक है। इन कीटों की उपस्थिति  के समय किसी भी प्रकार का छिड़काव या अन्य कृषि कार्य खेत में ना करें। इससे  परागण  के कार्य सरलता से व समय पर होता है। 

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मध्यप्रदेश की चुनिंदा मंडियों में क्या चल रहे सोयाबीन के भाव?

मध्य प्रदेश के अलग अलग मंडियों जैसे अशोकनगर, बड़नगर, मनावर, मंदसौर, खरगोन, खातेगांव, खुजनेर, थांदला, इछावर और बैतूल आदि में क्या चल रहे हैं सोयाबीन के भाव? आइये देखते हैं पूरी सूची।

विभिन्न मंडियों में सोयाबीन के ताजा मंडी भाव

जिला

कृषि उपज मंडी

न्यूनतम मूल्य (प्रति क्विंटल)

अधिकतम मूल्य (प्रति क्विंटल)

अशोकनगर

अशोकनगर

2711

6221

उज्जैन

बड़नगर

5540

6190

धार

बदनावर

4800

6285

होशंगाबाद

बाणपुरा

4551

5901

सागर

बाँदा

5500

6000

रायसेन

बेगमगंज

5100

6015

बैतूल

बैतूल

5501

6141

खरगोन

भीकनगांव

5496

6172

सागर

बीना

5000

6100

धार

धार

3310

6228

देवास

हाटपिपलिया

5550

6170

सीहोर

इछावर

4810

6254

अशोकनगर

ईसागढ़

5350

6000

होशंगाबाद

इटारसी

5562

5750

सीहोर

जावर

4900

6145

अलीराजपुर

जोबाट

5800

5800

शाजापुर

कालापीपल

4900

6200

शाजापुर

कालापीपल

4900

6135

नरसिंहपुर

करेली

4900

5050

उज्जैन

खाचरोड़

5700

6147

खंडवा

खंडवा

4000

6211

खरगोन

खरगोन

5785

6069

देवास

खातेगांव

3000

6191

देवास

खातेगांव

3125

6270

हरदा

खिरकिया

4100

6266

राजगढ़

खुजनेर

5750

6270

राजगढ़

खुजनेर

5800

6190

विदिशा

लटेरी

5005

6050

उज्जैन

महिदपुर

2500

6211

धार

मनावर

5500

6000

मंदसौर

मंदसौर

4401

6351

इंदौर

महू

3400

3400

उज्जैन

नगदा

5660

6289

राजगढ़

पचौरी

5700

6150

दमोह

पथरिया

5405

6235

मंदसौर

पिपलिया

2500

6240

रतलाम

रतलाम

5210

6300

सागर

रेहली

5500

5900

सागर

सागर

6275

6375

रतलाम

सैलाना

5801

6236

खरगोन

सनावद

5800

6005

इंदौर

सांवेर

5541

6300

राजगढ़

सारंगपुर

6110

6130

सतना

सतना

4991

4991

श्योपुर

श्योपुरबडोद

5936

5936

श्योपुर

श्योपुरकलां

5850

6050

शाजापुर

शुजालपुर

5000

6090

हरदा

सिराली

4800

6125

विदिशा

सिरोंज

5340

6502

शाजापुर

सुसनेर

5630

5900

स्रोत: एगमार्कनेट

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बैंगन की फसल में छोटी पत्ती समस्या एवं नियंत्रण के उपाय

यह माइकोप्लाजमा जनित रोग है। इस रोग का प्रसार लीफ हॉपर के माध्यम से होता है। इस रोग को बांझी रोग भी कहते हैं। इस रोग से बैंगन की उपज में 40% तक कमी आ सकती है।

इस रोग से ग्रसित पौधों का आकार बौना रह जाता है एवं रोग के अन्य लक्षण भी है जैसे पत्तियों पर चितकबरापन व अल्पविकसित होना, या पत्तियों का विकृत होकर छोटी एवं मोटी आकार का हो जाना। साथ ही इस रोग से नई पत्तियाँ सिकुड़कर व मुड़कर छोटी हो जाती हैं, जिस कारण पत्तियाँ तने से चिपकी हुई लगती हैं और पौधा झाड़ीनुमा हो जाता है। इस वजह से बैंगन के पौधों पर फल नहीं आते हैं। अगर फल आ भी जाये तो वो अत्यंत कठोर होते हैं। 

प्रबंधन:- 

  • तमिलनाडु एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के आधार पर संक्रमित पौधों को हटाकर नष्ट कर दें। 

  • रोपाई से पहले पौध को 0.2% कार्बोफ्यूरान 50 एसटीडी घोल में डुबाये (नियंत्रण कीट वेक्टर) डाइमेथोएट 0.3% का छिड़काव करें। 

  • जैविक नियंत्रण के लिए, ब्रिगेड बी (बवेरिया बेसियाना 1.15% डब्ल्यूबी) @ 1 किग्रा/एकड़ 150 -200 लीटर पानी के हिसाब से छिड़काव करें।

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कीटनाशकों का छिड़काव करते समय रखी जाने वाली सावधानियां

  • प्रिय किसान भाइयों, कीटनाशकों का छिड़काव करते समय सेफ्टी किट का अवश्य ही प्रयोग करें, जैसे – मास्क, चस्मा, दस्ताना, एवं पूरे कपडे पहने। जिससे नाक, मुँह अच्छी तरह से ढ़क जाते हैं और खतरा का डर नहीं रहता है। 

  • अगर नोज़ल जाम हो गया हो तो मुँह से न फूकें और न ही मुँह से पानी खींचे। 

  • कीटनाशक हमेशा अधिकृत दुकान से ही ख़रीदें एवं खरीदने के बाद जीएसटी युक्त बिल जरूर लें। 

  •  इन कीटनाशकों को बच्चों एवं पशुओं की पहुंच से दूर रखें। 

  • कीटनाशक के साथ जो लीफलेट आती है उसे अच्छा से पढ़ें उसके बाद ही इनका प्रयोग करें।

  • कीटनाशकों के छिड़काव के समय न तो कुछ खाये और न ही धूम्रपान करें। छिड़काव सुबह या शाम के समय करें। 

  • जब तेज हवा चल रही हो तब छिड़काव न करें। 

  • कीटनाशक के खाली डिब्बों को पशु एवं पानी के आस पास न फेंके।

  • कीटनाशकों का छिड़काव करने के बाद, अच्छी तरह से पंप को धुलकर रखें एवं सेफ्टी किट को भी साफ रखें।

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पत्ता गोभी एवं फूलगोभी में ब्लैक रॉट की रोकथाम के उपाय

यह रोग जैंथमोनस कैम्पेस्ट्रिस पी.वी.नामक जीवाणु के कारण होता है। यह पत्ता गोभी तथा फूलगोभी में सबसे विनाशकारी होता है। इस रोग के लक्षण आमतौर पर पत्ती के किनारे पर पीलेपन से शुरू होते हैं, जिस कारण ‘वी’ आकार के धब्बे बन जाते हैं। जो कि हरिमाहीनता एवं पानी में भीगे जैसे दिखाई देते हैं। इस रोग की वजह से बाद में संक्रमित पत्तियों की शिरायें काली हो जाती हैं, अधिक संक्रमण की अवस्था में यह रोग गोभी के अन्य भागों पर भी दिखाई देता है। जिससे फूल के डंठल अंदर से काले होकर सड़ने लगते हैं और अंत में सड़कर मर जाते हैं।

रोकथाम के उपाय 

  • समय पर खरपतवार नियंत्रण करें। 

  • निर्धारित मात्रा में नाइट्रोजन युक्त उर्वरकों का प्रयोग करें। 

  • जल निकासी की उचित व्यवस्था करें। 

  • जैविक नियंत्रण के लिए, मोनास कर्ब (स्यूडोमोनास फ्लोरेसेंस) @ 500 ग्राम प्रति एकड़ 150-200 लीटर पानी के हिसाब से छिड़काव करें।

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जानिए, लेडी बर्ड बीटल किस तरह से है किसान का मित्र

  • किसान भाइयों, लेडी बर्ड बीटल नामक लाभदायक छोटा जैविक कीट है। जो कि किसानों सहित उनकी फसल का भी मित्र है।

  • ये रस चूसने वाले कीट थ्रिप्स, माहू, स्केल्स और मकड़ी को खा कर नष्ट कर देते हैं और फसल की रक्षा करते हैं।

  • कई फसलों में कीटनाशक का छिड़काव भी न हो तो भी लेडी बर्ड बीटल, उसमें लगने वाले कीट को खाकर उनकी संख्या कम करके फसलों को नष्ट होने से बचाता है।

  • इसके साथ ही पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में सहयोग करता है। एक लेडी बर्ड बीटल एक दिन में 100  से 200 तक माहू को खा सकते हैं।

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औषधीय गुणों से भरपूर कुल्फा की खेती से करें बढ़िया कमाई

कुल्फा पौध के बारे में कम ही लोग जानते होंगे। इस पौधे का उपयोग औषधी के रूप में किया जाता है। इस बात का पता न होने की वजह से अब तक किसान इसे खरपतवार समझते आ रहे थे। हालांकि कुल्फा के औषधीय गुणों का पता चलते ही अब इसकी खेती व्यवसायिक तौर पर की जाने लगी है। 

औषधीय गुणों का खजाना

कुल्फा को औषधीय पौधों की सूची में रखा गया है। विशेषज्ञों के अनुसार इसकी पत्ती व फल में एंटीऑक्सीडेंट्स और कैरेटिनाइड्स भरपूर मात्रा में पाया जाता है, जो कि शरीर के लिए बहुत फायदेमंद होता है। इस कारण चिकित्सा के क्षेत्र में इसकी काफी मांग है। ऐसे में कुल्फा की खेती के ज़रिए बढ़िया कमाई की जा सकती है।

खेती के लिए सही मिट्टी और मौसम का चुनाव

कुल्फा की खेती किसी भी प्रकार की मिट्टी में की जा सकती है। जुलाई और अगस्त यानी मॉनसून सीजन में इसकी खेती करना बढ़िया रहता है। बता दें कि इसकी खेती के लिए गर्म जलवायु सबसे ज्यादा अनुकूल माना जाता है, क्योंकि ठंडे मौसम में इसके पौधे मर जाते हैं। 

खेती की बात करें तो बीज रोपण के 4 से 6 हफ्ते के बाद इसकी फसल कटाई के लिए तैयार हो जाती है। औषधीय गुणों की खान होने की वजह से कुल्फा की बाजार में बढ़िया दामों पर बिक्री हो जाती है। वहीं दूसरी ओर औषधी बनाने वाली कंपनियां इसके फल और पत्तियों को किसानों से हाथों-हाथ खरीद लेते हैं। ऐसे में कम समय में किसानों को बढ़िया मुनाफा प्राप्त हो जाता है।

स्रोत : आज तक

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बैंगन की फसल में फल गलन/फल सड़न नियंत्रण के उपाय

  • किसान भाइयों, बैंगन की फसल में फल गलन फाइटोफ्थोरा निकोटियाना नामक फफूंद के कारण होता है।

  • इस रोग के लक्षण पत्ती, तना एवं फल पर दिखाई देता है। अधिक नमी के कारण बैंगन की फसल में रोग का प्रसार तेजी से होता है। 

  • जिसके कारण फलों पर जलीय सूखे हुए धब्बे दिखाई देने लगते हैं, जो बाद में धीरे-धीरे दूसरे फलो में भी फैलने लगता है। 

  • इस रोग से प्रभावित फल की ऊपरी सतह भूरे रंग की हो जाती है, जिस पर सफ़ेद रंग के कवक विकसित हो जाती है। अंत में फल पौध से टूट कर गिर जाता है। 

रोकथाम  के उपाय 

  • तमिलनाडु एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के द्वारा सुझाय गए उपाय अपनाकर इस समस्या से बचा जा सकता है।  

  • प्रभावित फलों को हटाना और नष्ट कर देना चाहिए। 

  • जैविक प्रबंधन : जैविक उपचार के रूप में मोनास कर्ब (स्यूडोमोनास फ्लोरोसेंस) @ 500 ग्राम/एकड़ 150 -200 लीटर पानी के हिसाब से छिड़काव करें।

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