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मक्का खरीफ ऋतु की प्रमुख फसल है। हालांकि जहां सिंचाई के साधन हैं, वहां रबी और खरीफ की अगेती फसल के रूप में मक्का की खेती की जा सकती है। मक्का कार्बोहाइड्रेट का बहुत अच्छा स्रोत है। यह एक बहुपयोगी फसल है, मनुष्य के साथ- साथ पशुओं के आहार का प्रमुख अवयव भी है तथा मक्का की खेती का औद्योगिक क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण स्थान है।
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मक्का फसल को खरपतवार रहित होना चाहिए। जिससे सीधे मुख्य फसल ही पोषक तत्व ग्रहण करेंगे और पोषक तत्व का नुकसान नहीं होगा एवं फसल भी स्वस्थ रहेगी।
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मक्का की अधिक पैदावार लेने के लिये पोषक तत्व प्रबंधन एक महत्वपूर्ण उपाय हैं। यूरिया 35 किग्रा, सूक्ष्म पोषक तत्व मिश्रण केलबोर (बोरॉन 4 + कैल्शियम 11 + मैग्नीशियम 1 + पोटेशियम 1.7 + सल्फर 12 %) @ 5 किग्रा प्रति एकड़ के हिसाब से भुरकाव करें।
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मक्का की फसल में 40 से 45 दिन की अवस्था में फूल आना शुरू होता है। ज्यादा फूल लगने के लिए, होमोब्रासिनोलॉइड 0.04% डब्ल्यू/डब्ल्यू (डबल) @ 100 मिली प्रति एकड़ 150 से 200 लीटर पानी के हिसाब से छिड़काव करें।
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मिर्च की फसल में पत्तियाँ मुड़ने की समस्या और समाधान
मिर्च की फसल में पत्ता मोडक बीमारी सबसे घातक एवं ज्यादा नुकसान पहुंचाने वाली बीमारी है। जिसे विभिन्न स्थानों में कुकड़ा या चुरड़ा-मुरड़ा रोग के नाम से जाना जाता है। यह रोग न होकर, थ्रिप्स, सफ़ेद मक्खी, व मकड़ी के प्रकोप के कारण होता है।
सफेद मक्खी –
इस कीट का वैज्ञानिक नाम (बेमेसिया टेबेसाई) है इस कीट के शिशु एवं वयस्क, शिशु पत्तियों की निचली सतह पर चिपके रहकर रस चूसते रहते हैं। भूरे रंग के शिशु अवस्था पूरी होने के बाद वहीं पर रहकर प्यूपा में बदल जाते हैं। ग्रसित पौधे पीले व तैलीय दिखाई देते हैं। जिन पर काली फंफूदी लग जाती हैं। यह कीड़े न केवल रस चूसकर फसल को नुकसान करते हैं। बल्कि पौधों पर चिपचिपा पदार्थ छोड़ती हैं, जिससे फफूंद जनित रोग की सम्भावना बढ़ जाती है। इसका प्रकोप होने पर पौधों की पत्तियां सुकड़कर मुड़ने लगती हैं।
नियंत्रण के उपाय
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इसके नियंत्रण के लिए, मेओथ्रिन (फेनप्रोपेथ्रिन 30% ईसी) @ 120 मिली + (सिलिको मैक्स) @ 50 मिली प्रति एकड़, 150 -200 लीटर पानी के हिसाब से छिड़काव करें।
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जैविक नियंत्रण के लिए, (बवे-कर्ब) बवेरिया बेसियाना @ 500 ग्राम/एकड़ 150 -200 लीटर पानी के हिसाब से छिड़काव करें।
मकड़ी –
इस कीट का वैज्ञानिक नाम पॉलीफैगोटार्सोनमस लैटस है। यह छोटे-छोटे जीव होते हैं, जो पत्तियों की निचली सतह से रस चूसते हैं। परिणामस्वरूप पत्तियां सिकुड़ कर नीचे की ओर मुड़ जाती हैं। जिन्हें साधारण आंखों से देखना संभव नहीं हो पाता है। यदि मिर्च की फसल में थ्रिप्स व मकड़ी का आक्रमण एक साथ हो जाये तो पत्तियां विचित्र रूप से मुड़ जाती हैं। इसके प्रकोप से फसल के उत्पादन में बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है।
नियंत्रण के उपाय
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इसके नियंत्रण के लिए, ओबेरोन (स्पाइरोमेसिफेन 22.90% एस सी) @ 160 मिली या ओमाइट (प्रोपरजाईट 57% ईसी) @ 600 मिली + (सिलिको मैक्स) @ 50 मिली प्रति एकड़, 150 -200 लीटर पानी के हिसाब से छिड़काव करें।
थ्रिप्स
इस कीट का वैज्ञानिक नाम (सिर्टोथ्रिप्स डोरसालिस) है। यह छोटे एवं कोमल शरीर वाले हल्के पीले रंग के कीट होते है, इस कीट का शिशु एवं वयस्क दोनों ही मिर्च की फसल को नुकसान पहुंचाते है। यह पत्तियो एवं अन्य मुलायम भागों से रस चूसते हैं। थ्रिप्स के प्रकोप के कारण मिर्च की पत्तियां ऊपर की ओर मुड़ कर नाव का आकार धारण कर लेती है।
नियंत्रण के उपाय –
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फिपनोवा (फिप्रोनिल 5% एससी) @ 320 मिली या लैमनोवा (लैम्ब्डा साइहेलोथ्रिन 4.9% सीएस) @ 200 मिली + (सिलिको मैक्स) @ 50 मिली प्रति एकड़, 150 -200 लीटर पानी के हिसाब से छिड़काव करें।
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जैविक नियंत्रण के लिए, (बवे-कर्ब) बवेरिया बेसियाना @ 500 ग्राम / एकड़ के हिसाब से 150 -200 लीटर पानी के हिसाब से छिड़काव करें।
इसके अलावा किसान भाई कीट प्रकोप की सूचना के लिए, नीले चिपचिपे ट्रैप (ब्लू स्टिकी ट्रैप ) @ 8 -10, प्रति एकड़ के हिसाव से खेत में स्थापित करें| । यह कीट प्रकोप को इंगित करें जिसके आधार पर किसान भाई ऊपर बताए गए उपाय अपनाकर फसल को कीट प्रकोप से बचा सकते हैं।
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प्याज़ की फसल में खरपतवार प्रबंधन कैसे करें
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प्याज़ के अच्छे उत्पादन के लिए, फसल में पहली निराई बुवाई के 25-30 दिन बाद और दूसरी निराई बुवाई के 60-65 दिनों बाद करनी जरूरी हो जाता है। ये अवस्था क्रांतिक अवस्था कहलाती है।
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मृदा में प्राकृतिक रूप से, बहुत से मुख्य एवं सूक्ष्म पोषक तत्व पाए जाते हैं, जो अधिक खरपतवारों के प्रकोप के कारण प्याज़ की फसल को पूरी तरह नहीं मिल पाते हैं |
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इसके कारण फसलों में पोषक तत्वों की कमी हो जाती है और फसल की कुल उपज पर भी बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है |
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प्याज़ की अच्छी फसल उत्पादन के लिए खरपतवार प्रबंधन समय – समय पर करना बहुत आवश्यक होता है। इसके लिए निम्र प्रकार से खरपतवार प्रबंधन करना बहुत आवश्यक है। ध्यान रहे कि खरपतवार प्रबंधन बुवाई के ठीक 20-25 दिन पूरे होने पर और खरपतवार निकलने के तुरंत बाद करना चाहिए।
डेकेल (चौड़ी व सकरी पत्ती के लिए)
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डेकेल (प्रोपाक्विज़ाफोप 5% + ऑक्सीफ्लुरोफेन 12% ईसी) @ 350 मिली/एकड़, 150 से 200 लीटर पानी के हिसाब से छिड़काव करें। फ्लैट फैन नोज़ल का प्रयोग करें एवं खेतो में नमी बनाये रखें। खरपतवार की 2-4 पत्ती के अवस्था में छिड़काव करने पर सर्वोत्तम परिणाम प्राप्त होता है।
टरगा सुपर (सकरी पत्ती के लिए)
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टरगा सुपर (क्विज़ालोफॉप एथिल 5% ईसी) @ 300 मिली, प्रति एकड़ 150 से 200 लीटर पानी के हिसाब से छिड़काव करें। यह एक चयनात्मक शाकनाशी है। फ्लैट फैन नोज़ल का प्रयोग करें एवं खेतो में नमी बनाये रखें। साथ ही 2-4 पत्ती के चरण में छिड़काव करने पर सर्वोत्तम परिणाम प्राप्त होता है। इसका उपयोग चौड़ी पत्ती वाली फसलों में संकरी पत्ती वाले खरपतवारों को नियंत्रित करने के लिए किया जाता है।
एजिल (सकरी पत्ती के लिए)
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प्रोपाक्विज़ाफॉप 10% ईसी @ (एजिल) 250 मिली, प्रति एकड़ 150 से 200 लीटर पानी के हिसाब से छिड़काव करें। यह एक चयनात्मक खरपतवारनाशी है। इसका उपयोग वार्षिक और बारहमासी घास को नियंत्रण के लिए किया जाता है। फ्लैट फैन नोज़ल का प्रयोग करें एवं खेतो में नमी बनाये रखे। खरपतवार की 2-4 पत्ती के अवस्था में छिड़काव करने पर सर्वोत्तम परिणाम प्राप्त होता है।
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देश के विभिन्न मंडियों में 21 जुलाई को क्या रहे फलों और फसलों के भाव?
देश के विभिन्न शहरों में फलों और फसलों की कीमतें क्या हैं? |
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मंडी |
फसल |
न्यूनतम मूल्य (किलोग्राम में) |
अधिकतम मूल्य (किलोग्राम में) |
लखनऊ |
प्याज़ |
10 |
11 |
लखनऊ |
प्याज़ |
12 |
13 |
लखनऊ |
प्याज़ |
14 |
– |
लखनऊ |
प्याज़ |
15 |
16 |
लखनऊ |
प्याज़ |
10 |
– |
लखनऊ |
प्याज़ |
12 |
– |
लखनऊ |
प्याज़ |
15 |
– |
लखनऊ |
प्याज़ |
17 |
– |
लखनऊ |
लहसुन |
25 |
– |
लखनऊ |
लहसुन |
30 |
– |
लखनऊ |
लहसुन |
30 |
38 |
लखनऊ |
लहसुन |
45 |
50 |
लखनऊ |
आलू |
20 |
– |
लखनऊ |
आम |
30 |
– |
लखनऊ |
अनन्नास |
20 |
25 |
लखनऊ |
हरा नारियल |
46 |
50 |
लखनऊ |
मोसंबी |
32 |
36 |
लखनऊ |
शिमला मिर्च |
50 |
60 |
लखनऊ |
हरी मिर्च |
40 |
45 |
लखनऊ |
नींबू |
40 |
45 |
गुवाहाटी |
प्याज़ |
14 |
– |
गुवाहाटी |
प्याज़ |
16 |
– |
गुवाहाटी |
प्याज़ |
18 |
– |
गुवाहाटी |
प्याज़ |
19 |
– |
गुवाहाटी |
प्याज़ |
13 |
– |
गुवाहाटी |
प्याज़ |
17 |
– |
गुवाहाटी |
प्याज़ |
18 |
– |
गुवाहाटी |
प्याज़ |
19 |
– |
गुवाहाटी |
प्याज़ |
15 |
– |
गुवाहाटी |
प्याज़ |
20 |
– |
गुवाहाटी |
प्याज़ |
21 |
– |
गुवाहाटी |
प्याज़ |
22 |
– |
गुवाहाटी |
लहसुन |
22 |
27 |
गुवाहाटी |
लहसुन |
28 |
35 |
गुवाहाटी |
लहसुन |
35 |
40 |
गुवाहाटी |
लहसुन |
40 |
42 |
गुवाहाटी |
लहसुन |
23 |
26 |
गुवाहाटी |
लहसुन |
27 |
35 |
गुवाहाटी |
लहसुन |
35 |
40 |
गुवाहाटी |
लहसुन |
40 |
42 |
शाजापुर |
प्याज़ |
3 |
4 |
शाजापुर |
प्याज़ |
5 |
7 |
शाजापुर |
प्याज़ |
9 |
13 |
शाजापुर |
प्याज़ |
15 |
– |
जयपुर |
प्याज़ |
13 |
14 |
जयपुर |
प्याज़ |
16 |
– |
जयपुर |
प्याज़ |
19 |
20 |
जयपुर |
प्याज़ |
5 |
6 |
जयपुर |
प्याज़ |
8 |
– |
जयपुर |
प्याज़ |
9 |
– |
जयपुर |
प्याज़ |
12 |
– |
जयपुर |
लहसुन |
8 |
10 |
जयपुर |
लहसुन |
15 |
18 |
जयपुर |
लहसुन |
22 |
25 |
जयपुर |
लहसुन |
30 |
35 |
सोयाबीन में 15 से 20 दिनों की अवस्था पर रोग एवं कीट नियंत्रण के उपाय
सोयाबीन की फसल में 15 से 20 दिन की अवधि में सामान्यतः रस चूसक कीट – सफ़ेद मक्खी , जैसिड, एवं लीफ ईटिंग कैटरपिलर, गर्डल बीटल एवं कवक जनित रोग जैसे आद्र गलन, जड़ गलन, रस्ट आदि की समस्या दिखाई देती है।
नियंत्रण –
-
पत्ता खाने वाली इल्ली एवं फफूंद जनित रोग की समस्या के लिए – इमानोवा (इमामेक्टिन बेंजोएट 5% एस जी ) @ 100 ग्राम + सिलिको मैक्स @ 50 मिली,+ रोको (थायोफिनेट मिथाइल 70 % W/W) @ 300 ग्राम, प्रति एकड़ 150 से 200 लीटर पानी के हिसाब से छिड़काव करें |
-
रस चूसक कीट, सफ़ेद मक्खी, माहू एवं हरा तेला के नियंत्रण के लिए, थियानोवा-25 (थियामेंथोक्साम 25% WG)@100 ग्राम + विगरमैक्स जेल गोल्ड (वानस्पतिक अर्क, समुद्री शैवाल के अर्क और ट्रेस तत्व) @ 400 ग्राम + सिलिको मैक्स @ 50 मिली, प्रति एकड़ 150 से 200 लीटर पानी के हिसाब से छिड़काव करें।
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खड़ी फसल में सफेद ग्रब के नियंत्रण के लिए डेनिटोल (फेनप्रोपाथ्रिन 10% ईसी) @ 500 मिली ,या डेनटोटसु (क्लोथियानिडिन 50.00% डब्ल्यूजी) @ 100 ग्राम को,15 -20 किलो रेत में मिलाकर प्रति एकड़ भुरकाव या ड्रेन्च करें |
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गर्डल बीटल के नियंत्रण के लिए लैमनोवा (लैम्ब्डा-साइहलोथ्रिन 4.9% ईसी) @ 200 मिली या नोवालक्सम (थियामेथोक्सम 12.6% + लैम्ब्डा साइहलोथ्रिन 9.5% जेडसी) @ 80 मिली + सिलिको मैक्स @ 50 मिली, प्रति एकड़ 150 से 200 लीटर पानी के हिसाब से छिड़काव करें।
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रस्ट के नियंत्रण के लिए मिल्ड्यूविप (थियोफैनेट मिथाइल 70% डब्ल्यूपी) @ 300 ग्राम या नोवाकोन (हेक्साकोनाजोल 5% एससी) 400 मिली + सिलिको मैक्स @ 50 मिली, प्रति एकड़ 150 से 200 लीटर पानी के हिसाब से छिड़काव करें।
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धान की फसल में रोपाई के 10 से 15 दिन बाद खरपतवार एवं पोषक प्रबंधन
नॉमिनी गोल्ड (उद्भव के बाद)
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धान खरीफ ऋतु की प्रमुख फसल है, परन्तु जहां सिंचाई के साधन हैं, वहां रबी और खरीफ दोनों ऋतुओं में धान की खेती की जा सकती है। खरीफ की फसल में रबी की अपेक्षा ज्यादा खरपतवार होता है। खरपतवार के नियंत्रण के लिए – धान की रोपाई के 10 से 15 दिन बाद, 2 से 5 पत्ती वाली अवस्था में, बिस्पायरीबैक सोडियम 10% एस सी (नॉमिनी गोल्ड) @ 80 -100 मिली, प्रति एकड़ 150 से 200 लीटर पानी के हिसाब से छिड़काव करें।
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फ्लैट फैन नोज़ल का प्रयोग करें। आवेदन के समय खेत से पानी को बाहर निकाल दे, आवेदन के 48 – 72 घंटे के भीतर खेत में फिर से पानी चला दे। एवं खरपतवार उभरने को रोकने के लिए 5-7 दिनों तक पानी बनाए रखें।
विशेषताएँ
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नॉमिनी गोल्ड सभी प्रकार की धान की खेती यानी सीधे बोए गए धान, धान की नर्सरी और रोपित धान के लिए एक पोस्ट इमर्जेंट, व्यापक स्पेक्ट्रम, प्रणालीगत शाकनाशी है।
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नॉमिनी गोल्ड धान की प्रमुख घास और चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों को नियंत्रित करता है।
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नॉमिनी गोल्ड धान के लिए सुरक्षित है। नोमिनी गोल्ड जल्दी से खरपतवार में अवशोषित हो जाता है और उपयोग के 6 घंटे बाद भी बारिश होने पर भी परिणाम पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।
2,4 डी से खरपतवार प्रबंधन
चौड़ी पत्ती के खरपतवार को नियंत्रण करने के लिए, रोपाई के 20 से 25 दिन बाद, 2,4-डी एथिल एस्टर 38% ईसी (वीडमार /सैकवीड 38) @ 400 से 1000 मिली, प्रति एकड़ 150 – 200 लीटर पानी के हिसाब से छिड़काव करें।
पोषक प्रबंधन
खरपतवार नाशक प्रयोग के एक सप्ताह बाद, यूरिया @ 40 किग्रा, जिंक सल्फेट (ज़िंकफेर) @ 5 किग्रा, सल्फर 90% WG (कोसावेट) @ 3 किग्रा, कारटाप हाइड्रोक्लोराइड 4% जीआर (केलडान) @ 7.5 किग्रा, या फिप्रोनिल 0.3% जीआर (फैक्स, रीजेंट), फिपनोवा 7.5 किग्रा क्लोरएन्ट्रानिलिप्रोल 4% जीआर (फरटेरा) @ 4 किग्रा को आपस में मिलकर मिट्टी में प्रयोग करें।
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सोयाबीन में बोखनी की समस्या एवं निवारण
बोखनी (कोमेलिना बैंगालेंसिस), यह बहुवर्षीय चौड़ी पत्ती वाला खरपतवार है, इसे स्थानीय भाषा में केना, बोकानदा, बोखना/बोखनी, कानकौआ आदि के नाम से जानते हैं। ये सोयाबीन के अलावा मक्का, धान आदि फसलों में भी अधिक देखने को मिलता है। इसे नियंत्रित करना विशेष रूप से कठिन है, क्योंकि जमीन के ऊपर और मिट्टी के नीचे, तने के टूटे हुए टुकड़े आसानी से जड़ पकड़ लेते हैं। सोयाबीन की बेहतर फसल उत्पादन के लिए खरपतवार प्रबंधन समय – समय पर करना बहुत आवश्यक होता है।
इससे फसलों में होने वाले नुकसान
ये हवा, पानी, सूर्य का प्रकाश , खाद, पोषक तत्व आदि को ग्रहण कर लेते हैं, जिससे की मुख्य फसल के साथ प्रतिस्पर्धा करते हैं। जिससे सोयाबीन की बढ़वार कम होती है और पौधा कमजोर रह जाता है। इसे आरम्भिक अवस्था में यदि नियन्त्रित न किया जाये, तो उपज में 40 से 50 % तक की गिरावट देखी जा सकती है।
नियंत्रण के उपाय
यांत्रिक विधि : सोयाबीन से अच्छे उत्पादन के लिए, फसल में पहली निराई, बुवाई के 15-20 दिन बाद और दूसरी निराई बुवाई के 40-45 दिनों बाद करनी जरूरी हो जाता है।
रासायनिक विधि : बोखनी या बोखना के अच्छे नियंत्रण के लिए अंकुरण के 12 से 20 दिन के अंदर 2 से 3 पत्ती की अवस्था में खरपतवार नाशक का उपयोग करें। क्लोबेन (क्लोरिमुरॉन एथिल) @ 15 ग्राम या वीडब्लॉक(इमिजाथापर 10 % एस एल) @ 400 मिलि + सिलिको मैक्स @ 50 मिली प्रति एकड़ 150 – 200 लीटर पानी के हिसाब से छिड़काव करें। छिड़काव के समय फ्लैट फेन नोजल का प्रयोग करें एवं खेत में नमी बनाये रखे।
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सोयाबीन में पत्ती खाने वाली इल्ली के रोकथाम के उपाय
सोयाबीन की फसल में जिस प्रकार रस चूसक कीटों का प्रकोप होता है, ठीक उसी प्रकार इल्लियाँ जैसे तम्बाकू की इल्ली,सेमीलूपर,ग्राम पॉड बोरर आदि का प्रकोप बहुत अधिक होता है। ये सोयाबीन की फसल में तना, फूल एवं फल को नुकसान पहुंचाते हैं।
सेमीलूपर :- सेमीलूपर सोयाबीन की फसल पर बहुत अधिक आक्रमण करता है। सोयाबीन की फसल की कुल उपज में 30-40% तक हानि का कारण बनता है। सोयाबीन की फसल के प्रारंभिक चरणों से ही इसका प्रकोप हो जाता है। यह फसल की इस अवस्था में बहुत प्रभावित करता है और यदि इस इल्ली का प्रकोप फली या फूल वाली अवस्था में होता है तो, इससे सोयाबीन की उपज में काफी नुकसान होता है। इल्ली का प्रकोप आमतौर पर जुलाई के अंत और सितंबर माह के शुरुआत तक होता है।
बिहार हेयरी कैटरपिलर (स्पाइलोसोमा ओबलीकुआ) :-
नवजात इल्लियाँ झुंड में रहती हैं एवं सभी एक साथ मिलकर पत्तियों पर आक्रमण करके हरे भाग को खुरच कर खा जाती है। एवं बाद में पूरे पौधे पर फैल कर सम्पूर्ण पौधों को नुकसान पहुंचाती है। इन इल्लियों के द्वारा खाये गये पत्तियों पर सिर्फ जाली ही रह जाती है।
तम्बाकू की इल्ली
इस कीट के लार्वा सोयाबीन की पत्तियों को खुरचकर पत्तियों कें क्लोरोफिल को खाते हैं, जिससे खाये गए पत्ते पर सफ़ेद पीले रंग की रचना दिखाई देती है। अत्यधिक आक्रमण होने पर ये तना, कलिया, फूल और फलो को भी नुकसान पहुंचाते है। जिससे पौधों पर सिर्फ डन्डीया ही दिखाई देती है।
इनके नियंत्रण के लिए
प्रोफेनोवा (प्रोफेनोफोस 50% ईसी) @ 400 मिली या नोवालक्सम (थायमेथोक्सम 12.60% + लैम्ब्डा-सायहालोथ्रिन 9.50 % जेडसी) @ 50 मिली + सिलिको मैक्स @ 50 मिली, प्रति एकड़ 150 से 200 लीटर पानी के हिसाब से छिड़काव करें।
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सोयाबीन में पोषक तत्वों की कमी
सोयाबीन खरीफ ऋतू में बोई जाने वाली प्रमुख फसल है। सोयाबीन की फसल की बढ़वार व अच्छे विकास में, पोषक तत्वों का महत्वपूर्ण योगदान होता है। पोषक तत्व की कमी के कारण पौधो की पूरी तरह से विकास नहीं होता है फलस्वरूप बढ़वार रुक जाती है और फूल फलियां भी कम लगते हैं। जिससे उत्पादन में गिरावट आ सकती है। साथ ही इन पोषक तत्व की कमी के कारण पौधों में शारीरिक विकार हो सकते हैं, जैसे – आयरन की कमी के कारण पौधों में हरिमाहीनता हो जाती है।
इसके पूर्ति हेतु फसलों में संतुलित मात्रा में सूक्ष्म एवं मुख्य पोषक तत्वों की, समय-समय पर छिड़काव किया जाना चाहिए। इस अवस्था में वानस्पतिक विकास के लिए, पानी में घुलनशील उरवर्क दयाल (अनमोल) 19:19:19 @ 1 किग्रा + मिक्सॉल (लौह, मैंगनीज, जस्ता, तांबा, बोरॉन, मोलिब्डेनम) @ 250 ग्राम + विगरमैक्स जेल गोल्ड (वानस्पतिक अर्क, समुद्री शैवाल) @ 400 ग्राम, 150 से 200 लीटर पानी के हिसाब से छिड़काव करें।
Shareफसल की बुआई के साथ ही अपने खेत को ग्रामोफ़ोन एप के मेरे खेत विकल्प से जोड़ें और पूरे फसल चक्र में पाते रहें स्मार्ट कृषि से जुड़ी सटीक सलाह व समाधान। इस लेख को नीचे दिए गए शेयर बटन से अपने मित्रों संग साझा करें।
फसलों में जलभराव से होने वाले नुकसान एवं जल निकासी के उचित उपाय
जलभराव एक ऐसी स्थिति को संदर्भित करता है जब पानी अपनी इष्टतम आवश्यकता से अधिक मात्रा में खेत में मौजूद होता है।
खेत में अतिरिक्त जल से निम्न हानि होती है:
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वायु संचार में बाधा, मृदा तापक्रम में गिरावट, हानिकारक लवणों का एकत्रित होना, बीजांकुरण कम होना और कभी कभी बीज का सड़ना, जड़ों का सड़ना, लाभदायक जीवाणुओं की सक्रियता कम होना, नाइट्रोजन स्थिरीकरण क्रिया का कम होना साथ ही हानिकारक रोगों व कीटों का आक्रमण बढ़ना आदि। खेत में जलभराव को कम करने के लिए जल निकास जरूरी हैl
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जल निकास: फसल की उपज बढ़ाने हेतु भूमि की सतह अथवा अधोसतह से अतिरिक्त जल कृतिम रूप से बाहर निकालना ही जल निकास कहलाता हैं। कभी कभी अतिवृष्टि अथवा नहरों के कारण जल निकास जरूरी हो जाती है।
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जल निकास के लाभ: उचित वायु संचार, मृदा ताप में सुधार, लाभदायक जीवाणुओं की सक्रियता बढ़ना, मृदा कटाव को रोकना, हानिकारक रोगों व कीटों की रोकथाम, पौधों में नाइट्रोजन की क्रिया का बढ़ना आदि।
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