सफ़ेद मक्खी से नुक्सान के लक्षण एवं नियंत्रण

सफ़ेद मक्खी से नुक्सान के लक्षण एवं नियंत्रण:-

  • सफेद मक्खी एक रस चूसने वाली कीट होती है जो पत्तियों के निचले हिस्से पर बहुत संख्या में होती है| जब ग्रसित पौधे प्रभावित होते हैं, पंख वाले वयस्कों के बड़े झुण्ड हवा में उड़ते हैं।
  • शिशु और वयस्कों दोनों पोधे के नई वृद्धि से रस को चूसकर पौधों को नुकसान पहुंचा है, जिससे वृद्धि रुक जाती, पत्तियाँ पीली हो जाती है और पैदावार कम होती है। पौधे कमजोर और बीमारी के लिए अतिसंवेदनशील हो जाते हैं।
  • माहू की तरह, सफ़ेद मक्खी भी मधुस्त्राव छोड़ती है जिससे पत्तियाँ चिपचिपी हो जाती है और काली फफूद से घिर जाती है|
  • यह कई पौधे के वायरस रोग फ़ैलाने करने के लिए भी ज़िम्मेदार हैं।
  • 250 से अधिक फसलो को यह प्रभावित करता है जैसे निम्बू, कद्दू, आलू, खीरा, अंगूर, टमाटर, मिर्च और गुड़हल आदि|
  • ट्रायज़ोफ़ॉस 40% ईसी 45 एमएल / 15 लीटर पानी या डायफेनथीओरोन 50% WP 20 ग्राम / 15 लीटर पानी या एसिटामिप्रिड 20 एसपी 10 ग्रा। / 15 लीटर पानी सफ़ेद मक्खी के खिलाफ प्रभावी हैं|

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आलू में पत्ति रोल विषाणु रोग का प्रबंधन

  • प्रभावित पौधे के पत्ते आकार में बहुत छोटे और झुर्रीदार दिखाई देते तथा पत्ती की शिरा के बीच का भाग पीले रंग का दिखाई देता है  | 
  • इस रोग का प्रबंधन वायरस मुक्त बीज का प्रयोग करके किया जा सकता है|
  • माहू मुक्त क्षेत्रो में बीज तैयार करे |
  • रोग वाहक माहू की जनसंख्या नियंत्रण के लिए उपयुक्त सम्पर्क/दैहिक एसीटामिप्रिड 20% SP @ 10 ग्राम /15 लीटर  पानी के साथ स्प्रे करे | या 
  • इमिडाक्लोप्रिड 17.8% SL @ 10मिली /15 लीटर पानी के साथ स्प्रे करे |
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आलू की फसल में कैसे नियंत्रित करे अगेती झुलसा रोग का नियंत्रण

  • प्रभावित पौधे की पत्ती की सतह पर भूरे से काले रंग के अंडाकार आकार मृत धब्बे दिखाई देते है | 
  • कार्बेन्डाजिम 12% + मैनकोजेब 63% @ 300 ग्राम/एकड़ | 
  • थियोफैनेट मिथाइल 70% डब्ल्यूपी @ 250 ग्राम/एकड़ | 
  • क्लोरोथ्रोनिल 75% WP @ 250 ग्राम/एकड़ | 
  • कसुगामाइसिन 5% + कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 46% WP @ 300 ग्राम/एकड़ | 
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लहसुन एवं प्याज में मकडी का नियंत्रण

लहसुन एवं प्याज में मकडी का नियंत्रण:-

  • व्यस्क एवं अवयस्क दोनों ही कोमल पत्तियों एवं कलियों के बीच में लहसुन एवं प्याज में रस चूसते है| पत्तियाँ पुरी नहीं खुल पाती है पूरे पौधे की छोटा, टेड़ा, घुमावदार एवं पीले धब्बे दार हो जाता है|
  • धब्बे अधिकाँश पत्तियों के किनारों पर दिखाई देते है|
  • माइटस के प्रभावशाली नियंत्रण के लिए,  घुलनशील सल्फर 80% का 3 ग्राम प्रति लीटर की दर से पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें।  
  • अधिक प्रकोप होने पर प्रोपरजाईट 57% का  400 मिली. प्रति एकड़ के अनुसार 7 दिन के अंतराल से दो बार छिड़काव करें |

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आलू में पत्ति रोल विषाणु रोग का प्रबंधन

आलू में पत्ति रोल विषाणु रोग का प्रबंधन:-

  • इस रोग का प्रबंधन वायरस मुक्त बीज का प्रयोग करके किया जा सकता है|
  • माहू मुक्त क्षेत्रो में बीज तैयार करे |
  • रोग वाहक माहू की जनसंख्या नियंत्रण के लिए उपयुक्त सम्पर्क/दैहिक कीटनाशको का प्रयोग करे|
  • माहू के प्रभावी नियंत्रण के लिए, एसिटामिप्रिड 20% एसपी @ 10 ग्रा / 15 लीटर पानी या इमिडेकलोप्रिड 17.8% एसएल @ 10 एमएल / 15 लीटर पानी का छिड़काव करे |

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भिन्डी में पीला शिरा रोग (यलो वेन मोजैक रोग ) का प्रबंधन

भिन्डी का पीला शिरा रोग (यलो वेन मोजैक रोग ) :-

  • यह बीमारी सफ़ेद मक्खी नामक कीट के कारण होती है|
  • यह बीमारी भिंडी की सभी अवस्था में दिखाई देती है|
  • इस बीमारी में पत्तियों की शिराएँ पीली दिखाई देने लगती हैं|
  • पीली पड़ने के बाद पत्तियाँ मुड़ने लग जाती हैं|
  • इससे प्रभावित फल हल्के पीले, विकृत और सख्त हो जाते है|

प्रबंधन:-

  • वायरस से ग्रसित पौधों और पौधों के भागों को उखाड़ के नष्ट कर देना चाहिए|
  • कुछ किस्मे जैसे परभणी क्रांति, जनार्धन, हरिता, अर्का अनामिका और अर्का अभय इत्यादि वायरस के प्रति सहनशील होती है|
  • पौधों की वृद्धि की अवस्था में उर्वरकों का अधिक उपयोग ना करें|
  • जहाँ तक हो सके भिंडी की बुवाई समय से पहले कर दें|
  • फसल में प्रयोग होने वाले सभी उपकरणों को साफ रखें ताकि इन उपकरणों के माध्यम से यह रोग अन्य फसलों में ना पहुँच पाए|
  • जो फसलें इस बीमारीं से प्रभावित होती है उन फसलों के साथ भिंडी की बुवाई ना करें|
  • सफ़ेद मक्खी के नियंत्रण के लिए 4-5 चिपचिपे प्रपंच/एकड़ उपयोग कर सकते है|
  • डाइमिथोएट 30% ई.सी. 250  मिली /एकड़ पानी मे घोल बना कर स्प्रे करें|
  • इमिडाइक्लोप्रिड 17.8% SL 80 मिली /एकड़ की दर से स्प्रे करें|

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भिन्डी में सिंचाई प्रबन्ध

भिन्डी में सिंचाई प्रबन्ध :-

  • पहली सिंचाई पत्तियो के निकलते समय करना चाहियें |
  • गर्मी में 4-5 दिन के अन्तराल से सिंचाई करनी चाहियें|
  • यदि तापमान 400C हो तो हल्की सिंचाई करते रहना चाहियें, जिससे मिट्टी में नमी रहे एवं फल अच्छे से आये|
  • पानी का जमाव या पौधो को मुरझाने से रोकना चाहियें|
  • ड्रिप सिंचाई पद्धति के व्दारा 85% तक पानी की बचत की जा सकती है|
  • फल/बीजो को बनाते समय सूखे की स्थिति में फसल को 70% तक की हानि होती है|

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करेला में लाल कीट का नियंत्रण

  • गहरी जुताई करने से भूमि के अन्दर उपस्थित प्यूपा या ग्रब ऊपर आ जाते है सूर्य की किरणों में मर जाते है |
  • बीजो के अंकुरण के बाद पौध के चारों तरफ भूमि में कारटाप हाईड्रोक्लोराईड 3 G दाने डाले|
  • बीटल को इकट्ठा करके नष्ट करें|
  • फसल में 2 किग्रा बिवेरिया बेसियाना + (साइपरमैथ्रिन 4% ईसी + प्रोफेनोफॉस 40% ईसी) @ 400 एमएल/एकड़ के हिसाब से स्प्रे करें
  • फसल को 2 किलोग्रामबिवेरिया बेसियाना + (लैम्ब्डा साइहलोथ्रिन 4.9% सीएस )@ 200 मि.ली./एकड़ की दर से छिड़काव करें।
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करेला के लाल कीट की पहचान

  • अंडे से निकले हुये ग्रब जड़ो, भूमिगत भागो एवं जो फल भूमि के संपर्क में रहते है उनको खाता है|
  • इन प्रभावित पौधे के खाये हुए जड़ो एवं भूमिगत भागों पर मृतजीवी फंगस का आक्रमण हो जाता है जिसके फलस्वरूप अपरिपक्व फल व लताएँ सुख जाती है|
  • बीटल पत्तियों को खाकर उनमे छेद कर देते है |
  • पौध अवस्था में बीटल का आक्रमण होने पर मुलायम पत्तियों को खाकर हानि पहुचाते है जिसके कारण पौधे मर जाते है |
  • संक्रमित फल मनुष्य के खाने योग्य नहीं रहते है | 
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प्याज में कंद के फटने से सम्बंधित रोग का नियंत्रण

    • एक समान सिंचाई और उर्वरकों की मात्रा उपयोग करने से कंदों को फटने से रोका जा सकता है|

 

  • धीमी वृद्धि करने वाले प्याज की किस्मों का उपयोग करने से इस विकार को कम कर सकते है|

 

 

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