सोयाबीन को चने की इल्ली से होगा नुकसान, जल्द करें बचाव

Soybean will be harmed by Gram pod borer
  • इस इल्ली का लार्वा पौधे के सभी हिस्सों पर आक्रमण करता है, लेकिन ये फूल और फली को खाना सबसे ज्यादा पसंद करते हैं।

  • प्रभावित फली पर ब्लैक होल दिखाई देता है तथा लार्वा भोजन करते समय फली से बाहर लटका हुआ दिखाई देता है।

  • छोटा लार्वा पत्तियों के क्लोरोफिल को खुरच-खुरच कर खाता है, जिससे पत्तियाँ कंकाल में परिवर्तित हो जाती हैं।

  • गंभीर संक्रमण की अवस्था में पत्तियां टूट कर गिरने लगती हैं तथा पौधा मर जाता है।

कैसे करें सोयाबीन में चने की इल्ली का प्रबंधन:-

  • वयस्क कीट के नियंत्रण के लिए फेरोमोन ट्रैप @ 8-10 प्रति एकड़ का उपयोग करें।

  • पहला स्प्रे प्रोफेनोवा (प्रोफेनोफॉस 50% EC) @ 300 मिली/एकड़ + ट्राईसेल (क्लोरोपायरीफॉस 20% EC) @ 500 मिली/एकड़।

  • दूसरा स्प्रे प्रोफेनोवा सुपर (प्रोफेनोफोस 40% EC + साइपरमेथ्रिन 4% EC) @ 400 मिली/एकड़ + इमानोवा (इमामैटिन बेंजोएट 5% SG) @ 80-100 ग्राम/एकड़।

  • तीसरा स्प्रे एमप्लिगो (क्लोरेंट्रानिलिप्रोएल 9.3% + लैम्ब्डा साइहलोथ्रिन 4.6% JC) @ 100 मिली/एकड़ या लार्वीन (थायोडिकार्ब 75% WP) @ 250 ग्राम/एकड़।

  • जैविक उपचार के रूप में बवे कर्ब (बवेरिया बेसियाना) @ 250 ग्राम/एकड़ की दर से स्प्रे करें।

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मिर्च की फसल में ना होने दें फल छेदक का प्रकोप, ऐसे करें बचाव

Management of Fruit borer in chilli
  • इस रोग में मिर्च के फल के आधार पर एक गोलाकार छेद पाया जाता है जिसकी वजह से फल और फूल परिपक्व होने से पहले ही गिर जाते हैं।

  • इस रोग में सामन्यतः इल्ली की लार्वा फलों के अंदर ही विकसित होती है। फिर इल्ली छोटी अवस्था में फलों पर एक छेद बनाकर नए विकसित फल को खाती हैं।

  • जब फल परिपक्व हो जाते हैं तब यह बीजों को खाना पसंद करती हैं। इस दौरान इल्ली अपने सिर फल के अंदर रख कर बीजों को खाती हैं। इस दौरान इल्ली का बाकी शरीर फल के बाहर रहता है।

  • इसके वयस्क कीट के नियंत्रण के लिए फेरोमोन ट्रैप @ 3-4 प्रति एकड़ का उपयोग करें।

  • इसकी रोकथाम हेतु पहले स्प्रे में प्रोफेनोवा (प्रोफेनोफॉस 50% EC) @ 300 मिली/एकड़ + ट्राईसेल (क्लोरोपायरीफॉस 20% EC) @ 500 मिली/एकड़ का उपयोग करें।

  • वहीं दूसरे स्प्रे में प्रोफेनोवा सुपर (प्रोफेनोफोस 40% EC + साइपरमेथ्रिन 4% EC) @ 400 मिली/एकड़ + इमानोवा (इमामैटिन बेंजोएट 5% SG) @ 80-100 ग्राम/एकड़ का उपयोग करें।

  • तीसरे स्प्रे में इमानोवा (इमामेक्टिन बेंजोएट 5% SG) @ 80-100 ग्राम/एकड़ + डेनिटोल (फेन्प्रोप्रेथ्रिन 10% EC) @ 250-300 मिली/एकड़ का उपयोग करें।

  • चौथे स्प्रे में एमप्लिगो (क्लोरेंट्रानिलिप्रोएल 9.3% + लैम्ब्डा साइहलोथ्रिन 4.6% JC) @ 100 मिली/एकड़ या लार्वीन (थायोडिकार्ब 75% WP) @ 250 ग्राम/एकड़ का उपयोग करें।

  • इसके जैविक उपचार के रूप में बवे कर्ब (बवेरिया बेसियाना) @ 250 ग्राम/एकड़ की दर से स्प्रे करें।

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सोयाबीन की फसल को एन्थ्रेक्नोज या पॉड ब्लाइट से रखें सुरक्षित

Protect Soybean crop from Anthracnose or Pod Blight
  • यह बीज एवं मिट्टी जनित रोग है, इनसे संक्रमित बीज लगाने पर प्रारंभिक तौर पर डंपिंग ऑफ (बीज या अंकुर सड़ने से पौधे की मृत्यु) की समस्या आ सकती है।

  • सोयाबीन में फूल आने की अवस्था में तने, पर्णवृन्त व फली पर लाल से गहरे भूरे रंग के अनियमित आकार के धब्बे दिखाई देते हैं।

  • बाद में ये धब्बे फफूंद की काली सरंचनाओं व छोटे कांटे जैसी संरचनाओं से भर जाते हैं।

  • पत्तीयों पर शिराओं का पीला-भूरा होना, मुड़ना एवं झड़ना इस बीमारी के लक्षण है।

नियंत्रण के उपाय

  • रोग सहनशील बीज किस्में जैसे एनआरसी 7 व 12 का उपयोग करें।

  • बुआई पूर्व बीज को वीटावैक्स (थायरम + कार्बोक्सीन) 2 ग्राम/किलो बीज की दर से उपचारित करें।

  • रोग का लक्षण दिखाई देने पर करमानोवा (कार्बेन्डाजिम 12% + मैन्कोजेब 63% WP) 400 ग्राम/एकड़ के अनुसार छिड़काव करें।

  • अधिक प्रकोप होने पर टेबुकोनाज़ोल 25.9% EC @ 200 मिली प्रति एकड़ की दर से स्प्रे करें।

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फसल के अच्छे उत्पादन के लिए जिंक तत्व होता है बेहद महत्वपूर्ण

Importance of Zinc or good crop production
  • फसल से जबरदस्त उपज प्राप्त करने में जिन तत्वों की सबसे ज्यादा आवश्यकता होती है उनमे सबसे प्रमुख तत्व है जिंक।

  • भारत में उपज की कमी के लिए चौथा सबसे महत्वपूर्ण तत्व भी जिनक को हीं माना जाता हैं और इसकी कमी से उपज में भारी कमी आती है।

  • आपको बता दें की ज़िंक फसलों के लिए आठ आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्वों में से एक है।

  • इसकी कमी से फसल की पैदावार और गुणवत्ता बहुत हद तक प्रभावित होती है और फसल की उपज में 20% तक की कमी आ जाती है।

  • जिंक पौधे के विकास के लिए अहम होता है, यह पौधों में, कई एंजाइमों और प्रोटीनों के संश्लेण में प्रमुख भूमिका निभाता है।

  • इसके साथ साथ ज़िंक ग्रोथ हार्मोन के निर्माण में भी महत्वपूर्ण योगदान देता है जिसके परिणाम स्वरूप इंटरनोड का आकार बढ़ता है।

  • इसकी कमी प्रायः क्षारीय और पथरीली मिट्टी में उगाई गई फसलों में होती है।

  • इसकी कमी के कारण नई पत्तियाँ छोटे आकार की एवं शिराओं के मध्य का हिस्सा चितकबरे रंग का हो जाता है।

  • इसकी कमी को दूर करने के लिए भूमि में “जिंक सल्फेट” 20 किलो ग्राम प्रति एकड़ की दर से प्रयोग कर के इससे होने वाले नुकसान को कम किया जा सकता है।

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एक ट्रायकोडर्मा के उपयोग से आपकी खेती में मिलेंगे कई लाभ

Trichoderma's importance in agriculture
  • मिट्टी में प्राकृतिक रूप से कई प्रकार के कवक पाए जाते हैं जिनमें से कुछ हानिकारक तो कुछ लाभकारी होते हैं और इन्ही लाभकारी कवकों में से एक ट्रायकोडर्मा भी होता है।

  • यह बहुत ही महत्त्वपूर्ण एवं कृषि की दृष्टि से एक उपयोगी जैव कवकनाशी है।

  • ट्रायकोडर्मा विभिन्न प्रकार के मिट्टी जनित रोगों जैसे फ्यूजेरियम, पिथियम, फाइटोफ्थोरा, राइजोक्टोनिया, स्क्लैरोशियम आदि से बचाव करता है।

  • फ़सलों को प्रभावित करने वाले रोग जैसे आर्द्र गलन, जड़ गलन, उकठा, तना गलन, फल सड़न, तना झुलसा आदि की रोकथाम में भी ट्रायकोडर्मा सहायक होता है।

  • यह रोग उत्पन्न करने वाले कारकों को रोकता है एवं फसल के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

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मिर्च की फसल पर होगा रस चूसक कीटों का हमला, कर लें तैयारी

Chilli crop will be attacked by sucking insects

मिर्ची की फसल में रस चूसने वाले कीट जैसे एफिड, जैसिड और थ्रिप्स का प्रकोप बहुत ज्यादा देखने को मिलता है। यह कीट मिर्च की फसल में पौधों के हरे हिस्से से रस चूस कर नुकसान पहुँचाते हैं, जिससे पत्तियां मुड़ जाती हैं और जल्दी गिर जाती हैं। रस चूसक कीटों के संक्रमण से फंगस और वायरस द्वारा फैलने वाली बीमारियों की संभावना बढ़ सकती हैं। अतः इन कीटों का समय पर नियंत्रण करना आवश्यक हैं।

नियंत्रण के उपाय

  • प्रोफेनोवा (प्रोफेनोफोस 50% EC) @ 400 मिली/एकड़ या

  • असताफ (एसीफेट 75% SP @ 250) ग्राम/एकड़ या

  • लैमनोवा (लैम्ब्डा सायहेलोथ्रिन 4.9% CS) @ 200-250 मिली/एकड़ या

  • फिपनोवा (फिप्रोनिल 5% SC) @ 300-350 मिली/एकड़ की दर से छिड़काव करें।

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मिर्च में बढ़ रहा कॉलर सड़न रोग, लक्षणों को पहचान कर करें उपचार

Collar rot disease increasing in chilli crop

इस रोग का प्रकोप होने पर फंगस सबसे पहले तना एवं जड़ के बीच कॉलर को ग्रसित करता है, जिस कारण मिट्टी के आस पास कॉलर पर सफेद एवं काले फफूंद दिखने लगते हैं। इसके अलावा तने के उत्तक हल्के भूरे और नरम हो जाता है और धीरे-धीरे मुरझाने लगता है। प्रकोप की अनुकूल परिस्थिति में यह रोग अन्य भाग को भी प्रभावित कर सकता है। अंत में रोग के कारण पौधे मुरझाकर मर जाते हैं।

रोकथाम हेतु इन उपायों को अपनाएं

  • रोगग्रस्त पौधे के अवशेषों को नष्ट करें।

  • जल निकास की व्यवस्था करें व फसल चक्र अपनाएं।

  • नर्सरी का निर्माण ऊँची जगह पर करें।

  • बीजों का उपचार करमानोवा (कार्बेन्डाजिम 12% + मैनकोजेब 64%) @ 3 ग्राम/किलो बीज की दर से करें।

  • बाविस्टिन (कार्बेन्डाजिम 50%) 300 ग्राम या नोवैक्सिल (मेटालेक्ज़िल 8% + मैनकोजेब 64%) @ 500 ग्राम/एकड़ की दर से घोल बनाकर 10 दिन के अंतराल पर दो बार ड्रेंचिंग करें।

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टमाटर में जड़ ग्रंथि सूत्रकृमि पहुंचाएगा नुकसान, ऐसे करें नियंत्रण

Root Knot Nematode will cause harm in tomato
  • जड़ ग्रंथि सूत्रकृमि जिसे नेमाटोड्स भी कहते हैं दरअसल जड़ों पर आक्रमण करते हैं एवं जड़ में छोटी छोटी गाँठ बना देते हैं। इस समस्या से ग्रसित टमाटर के पौधों की वृद्धि रुक जाती है एवं पौधा छोटा ही रह जाता है। इसका अधिक संक्रमण होने पर पौधा सूखकर मर जाता है और पत्तियों का रंग हल्का पीला हो जाता है।

  • इससे बचाव के लिए इसकी प्रतिरोधक किस्मों को उगाना चाहिए, भूमि की गहरी जुताई करनी चाहिए, नीम खली 80 किलो प्रति एकड़ की दर से उपयोग करना चाहिए। इसके अलावा कार्बोफ्युरोन 3% GR 8 किलो प्रति एकड़ की दर से उपयोग करना चाहिए। 

  • पेसिलोमाइसिस लिनेसियस (नेमेटोफ्री) बीज उपचार के लिए 10 ग्राम/किलोग्राम बीज, 50 ग्राम/मीटर वर्ग से नर्सरी उपचार करें। पेसिलोमाइसिस लिनेसियस (नेमेटोफ्री) 3 किलो/एकड़ की दर से मिट्टी उपचार करें।

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टमाटर की फसल में स्टेकिंग यानी सहारा देने की विधि क्यों है आवश्यक?

Know why staking is important in tomato crop

टमाटर का पौधा एक तरह की लता होती है, जिसके कारण पौधे फलों का भार सहन नहीं कर पाते हैं और नमी की अवस्था में मिट्टी के संपर्क में रहने से सड़ जाते हैं। जिस कारण से फसल नष्ट हो जाती हैं। इससे किसान को भारी नुकसान उठाना पड़ता है। साथ ही पौधे के नीचे गिरने से कीट और बीमारी भी अधिक लगती हैं। इसलिए टमाटर को नीचे गिरने से बचाने के लिए तार से बांध कर सुरक्षित रखते हैं।

पौधों की रोपाई के 2-3 हफ्ते बाद मेड़ के किनारे-किनारे दस फीट की दूरी पर दस फीट ऊंचे बांस के डंडे खड़े कर दिए जाते हैं। इन डंडों पर दो-दो फीट की ऊंचाई पर लोहे का तार बांधा जाता है। उसके बाद पौधों को सुतली की सहायता से उन्हें तार से बांध दिया जाता है जिससे ये पौधे ऊपर की ओर बढ़ते हैं। इन पौधों की ऊंचाई आठ फीट तक हो जाती है, इससे न सिर्फ पौधा मज़बूत होता है, फल भी बेहतर होता है। साथ ही फल सड़ने से भी बच जाता है।

स्टेकिंग लगाने का तरीका और फायदे:-

👉🏻 स्टेकिंग करने के लिए, मेड़ के किनारे-किनारे 10 फीट की दूरी पर 10 फीट ऊंचे बांस के डंडे खड़े कर दिए जाते है।

👉🏻इन डंडे पर 2-2 फीट की ऊंचाई पर लोहे का तार बांध दिया जाता है। उसके बाद पौधों को सुतली  की सहायता से उन्हें तार से बांध दिया जाता है, जिससे ये पौधे ऊपर की और बढ़ते हैं।

👉🏻पौधों की ऊंचाई 5-8 फीट तक हो जाती हैं, इससे न सिर्फ पौधा मजबूत होता है, बल्कि फल भी बेहतर होता है। साथ ही फल सड़ने से भी बच जाता है। इस विधि से खेती करने पर पारम्परिक खेती की तुलना में अधिक लाभ प्राप्त कर सकते है।

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धान की फसल में बढ़ेगा स्टेम बोरर का प्रकोप, जानें नियंत्रण के उपाय

Stem borer infestation will increase in paddy crop
  • धान की फसल में स्टेम बोरर के प्रकोप से डेडहर्ट्स या मृत टिलर नजर आने लगते हैं जिन्हें वनस्पति चरणों के दौरान आसानी से आधार से खींचा जा सकता है।

  • डेडहर्ट्स और व्हाइटहेड्स के लक्षण कभी-कभी चूहों और काले बग से पैदा होने वाले रोगों से होने वाले नुकसान के सामान भी हो सकते हैं।

  • स्टेम बोरर की क्षति की पुष्टि करने के लिए, धान की फसल में वानस्पतिक अवस्था में डेडहार्ट और प्रजनन अवस्था में व्हाइटहेड का निरीक्षण जरूर करें।

  • इसके नियंत्रण के लिए प्रोफ़ेनोवा सुपर (प्रोफेनोफोस 40% + साइपरमेथ्रिन 04% EC) @ 400 मिली/एकड़ या फिपनोवा (फिप्रोनिल 5% SC) @ 400 मिली/एकड़ या नोवालिस (फिप्रोनिल 40% + इमिडाक्लोप्रिड 40% WG) @ 40 ग्राम/एकड़ का उपयोग करें।

कृषि क्षेत्र एवं किसानों से सम्बंधित ऐसी ही महत्वपूर्ण जानकारियों के लिए ग्रामोफ़ोन के लेख प्रतिदिन जरूर पढ़ें और शेयर करना ना भूलें।

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