Field preparation for Soybean

सोयाबीन के लिए भूमि की तैयारी:-

  • खेत में 3-4 बार हल से जुताई कर मिट्टी को भुरभुरी कर पाटा चलाकर समतल करना चाहिए|
  • भूमि को तैयार करते समय 25 टन प्रति हेक्टेयर गोबर या कम्पोस्ट की पकी हुई खाद का प्रयोग करना  चाहिये |
  • नीम केक एवं पोल्ट्री फार्म खाद का उपयोग करने से पौधों की वृद्धि, गुणवत्ता एवं उत्पादन में बढ़ोत्तरी होती है साथ ही उर्वरकों की मात्रा को कम किया जा सकता है|

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Irrigation in Cauliflower

फूलगोभी में सिंचाई प्रबंधन:-

  • अच्छी फसल के लिए पर्याप्त नमी को बनाए रखना बहुत आवश्यक हैं|
  • रोपाई के बाद हल्का पानी दे |
  • उचित नमी बनाये रखने के लिए आवश्यकतानुसार 10-15 दिन के अन्तराल पर हल्की सिंचाई करे |
  • अगेती एवं मिड सीजन की फसल की सिंचाई मानसून पर निर्भर रहती है|
  • फूल बनते और बढ़ते समय उचित नमी बनाये रखना बहुत आवश्यक हैं |

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Germination before sowing in bitter gourd

करेला में बुआई पूर्व अंकुरण:-

  • करेले के बीज का आवरण कड़ा होता है, इसलिए 2-3माह पुराने बीजों को रात भर के लिए ठन्डे पानी में भिगोया जाता है|
  • बीजों को अच्छे अंकुरण के लिए 1-2 दिन तक नम कपड़े में लपेट कर रखा जाता हैं |
  • बीजों में अंकुरण के तुरंत बाद ही बो दिया जाता है |
  • बीजों को 2 सेमी. गहराई में बोना चाहिये |

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Season of planting of Cauliflower

फूलगोभी के रोपाई का समय

  • अगेती किस्मों की बुवाई मई से जून माह में की जाती हैं |
  • मध्यम किस्मों की बुवाई जून माह के अंतिम सप्ताह से लेकर जुलाई माह के मध्य की जाती हैं |
  • मध्य पछेती किस्मों की बुवाई अगस्त माह में की जाती हैं|
  • पछेती किस्मों की बुवाई सितम्बर से अक्टूबर माह के मध्य की जाती हैं|

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Field preparation of Cabbage:-

पत्तागोभी में भूमि की तैयारी:-

  • खेत में 3-4 बार हल से जुताई कर मिट्टी को भुरभुरी कर पाटा चलाकर समतल करना चाहिए|
  • भूमि को तैयार करते समय 25 टन प्रति हेक्टेयर गोबर या कम्पोस्ट की पकी हुई खाद का प्रयोग करना  चाहिये |
  • नीम केक एवं पोल्ट्री फार्म खाद का उपयोग करने से पौधों की वृद्धि, गुणवत्ता एवं उत्पादन में बढ़ोत्तरी होती है साथ ही उर्वरकों की मात्रा को कम किया जा सकता है|
  • बुवाई मौसम व भूमि के प्रकार के अनुसार मेढ़ व नाली में करनी चाहिए|

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Nutrient Management in Coriander

धनिया में पोषक तत्व प्रबंधन:-

  • 25 टन सड़ी गोबर की खाद, एजोस्पिरिलियम और पीएसबी कल्चर 2-2 kg प्रति हेक्टेयर बुआई के पहले दे |
  • 100 किलो नाईट्रोजन, 50 किलो फास्फोरस और 50 पोटाश प्रति हेक्टेयर दो भागो में आधा बुआई से पहले तथा आधा बुआई के 30 दिन बाद दे |
  • 50 किलो मैग्नीशियम सल्फेट प्रति हेक्टयर बुआई के पहले देना चाहिए |

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Control of White fly in Green Gram

मुंग में सफ़ेद मक्खी का नियंत्रण:-

  • शिशु एवं वयस्क पत्तियों के निचले सतह से रस चूसते है एवं मधु स्त्राव के उत्सर्जन से प्रकाश संश्लेषण में बाधा आती है|
  • पत्तियाँ रोगग्रस्त दिखती है सुटी मोल्ड से ढक जाती है | यह कीट पत्ति मोड़क विषाणु रोग व पीला शिरा विषाणु रोग का वाहक होकर इसे फैलाता है|
  • नियंत्रण:- पीले रंग वाले चिपचिपे प्रपंच खेत में कई जगह लगाए|
  • डायमिथोएट 30 मिली./पम्प या थायमेथोक्जोम 5 ग्राम/पम्प या एसीटामीप्रिड 15 ग्राम/ पम्प का स्प्रे 4-5 बार 10 दिन के अंतराल पर करे|

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Land preparation for Ginger/Turmeric

अदरक/हल्दी के लिए खेत की तैयारी:-

  • जमीन की 20 सेमी. गहराई तक जुताई करे |
  • ढ़ेलों को तोड़े |
  • इसके बाद एक और जुताई क्रास में करें |
  • लगभग 25 टन गोबर की खाद प्रति हे. की दर से मिलाये |
  • खाद मिलाने के लिए दो बार बखर करें |
  • फिर लेवलर की सहायता से जमीन समतल करे |

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Land Preparation of Cotton

कपास के लिए खेत की  तैयारी:-

  • खेत की चार-बार जुताई करने के पश्चात पाटा चलाकर भूमि को नरम,भुरभुरी एवं समतल कर लेना चाहिये |
  • भूमि को तैयार करते समय 25 टन प्रति हेक्टेयर गोबर या कम्पोस्ट की पकी हुई खाद का प्रयोग करना  चाहिये |
  • नीम केक एवं पोल्ट्री फार्म खाद का उपयोग करने से पौधों की वृद्धि, गुणवत्ता एवं उत्पादन में बढ़ोत्तरी होती है साथ ही उर्वरकों की मात्रा को कम किया जा सकता है|
  • फास्फोरस एवं  पोटाश की पुरी मात्रा और नाइट्रोजन की 25 से 33 प्रतिशत मात्रा का प्रयोग करना चाहिये |

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Land Preparation of Coriander

धनिया के लिये खेत की तैयारी:-

  • दो बार गहरी जुताई करने के बाद दो या तीन बखर से भूमि को भुरभुरी एवं ज़रुरी हो तो पाटा चला कर समतल बना लेना चाहिए|
  • खेत की तैयारी के समय अंतिम बखर करने से पहले 25 टन गोबर की खाद प्रति हेक्टेयर की दर से मिलाना चाहिए|
  • धनिया की बुवाई समतल ज़मीन पर की जाती है |
  • नीम केक एवं पोल्ट्री फार्म खाद का उपयोग करने से पौधों की वृद्धि, गुणवत्ता एवं उत्पादन में बढ़ोत्तरी होती है साथ ही उर्वरकों की मात्रा को कम किया जा सकता है|

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