Control of Stemphylium Blight in Onion

  • चोपाई के 30 दिन बाद 10-15 दिन के अंतराल पर या बीमारी के लक्षण दिखाई देने पर फफूंदनाशियों 
  • मेन्कोजेब 75%WP @ 500 ग्राम प्रति एकड़  
  • हेक्सकोनाज़ोल @ 400  मिली,प्रति एकड़ या  
  • प्रोपिकोनाज़ोल @ 200  मिली एकड़ का छिडकाव करे |

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Symptoms of Stemphylium Blight in Onion

स्टेमफाईटम झुलसा रोग:- 

  • छोटे पीले से नारंगी धब्बे या धारियां पत्ती के बीच में बनती है
  •  जो बाद में बड़ी धुरी के आकार से अंडाकार हो जाती है जो धब्बे के चारो ओर गुलाबी किनारे इसका लक्षण है| 
  • धब्बे पत्तियों के किनारे से नीचे की और बढ़ते है| धब्बे आपस में मिलकर बड़े क्षेत्र बनाते है पत्तियां झुलसी दिखाई है पौधे की सभी पत्तियां प्रभावित होती है| 

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Drip irrigation and Advantages of Drip Irrigation

अच्छी फसल के सफल उत्पादन के लिए पानी की उपलब्धता एक महत्वपूर्ण कारक है| लगातार बढ़ती हुई आबादी और जलवायु परिवर्तन के कारण ज़मीन में उपलब्ध जल की मात्रा कम होती जा रही है, जिस कारण लगातार फसलों के उत्पादन में कमी होते जा रही है| इसी समस्या के समाधान के लिए ड्रिप सिंचाई का आविष्कार किया गया जो कि, किसानों के लिए एक वरदान साबित हुई है| इस विधि में पानी को स्रोतों से प्लास्टिक की नलियों  द्वारा सीधा पौधों की जड़ों तक पहुंचाया जाता है और साथ ही यदि उर्वरकों को भी इनके माध्यम से पौधों की जड़ों तक पहुंचाया जाता है तो यह प्रक्रिया फर्टिगेशन कहलाती है|

लाभ –

  • अन्य सिंचाई प्रणाली की तुलना में 60-70% पानी की बचत होती है|  

  • ड्रिप सिंचाई के माध्यम से पौधों को अधिक दक्षता के साथ पोषक तत्त्व उपलब्ध करने में मदद मिलती है|

  • ड्रिप सिंचाई के माध्यम से पानी का अप-व्यय (वाष्पीकरण एवं रिसाव के कारण)  को रोक सकते हैं |

  • ड्रिप सिंचाई में पानी सीधे फसल की जड़ों में दिया जाता है। जिस कारण आस-पास की जमीन सूखी रहने से खरपतवार विकसित नहीं हो पाते हैं|

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Post Calving Challenges In Milk Cattles

  • प्रसव के बाद पशु की शारीरिक शक्ति कम हो जाती है इसके साथ-साथ कैल्शियम की कमी भी सामान्यता देखने को मिलती है जिसकी वजह से पशुओं में दूध का उत्पादन तो कम होता ही है, पशु को मिल्क फीवर होने की भी सम्भावना बढ़ जाती है, कुछ पशुओं को जेर गिराने में भी समस्या होती है| इस समय पशुओं का अच्छे से ख्याल रखना तथा सही मात्रा में और सही पशु आहार का देना चाहिये| साथ ही इसे शक्ति वर्धक पेय देना भी जरूरी होता है|

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Management of Wilt in Pea

  • कार्बोक्सीन 37.5 % + थायरम 37.5 % @ 3 ग्राम/किलो बीज या ट्रायकोडर्मा विरिडी @  5 ग्राम/किलो बीज से बुवाई के पूर्व बीजोपचार करें व अधिक संक्रमित क्षेत्रों में जल्दी बुवाई न करें ।
  • 3 वर्ष का फसल चक्र अपनायें  ।
  • इस रोगों को आश्रय देने वाले निंदाओं को नष्ट करें ।
  • माइकोराइज़ा @ 4 किलो प्रति एकड़ 15 दिन की फसल में भुरकाव करें|
  • फूल आने से पहले थायोफिनेट मिथाईल 75% @ 300 ग्राम/एकड़ का स्प्रे करें|
  • फली बनते समय प्रोपिकोनाज़ोल 25% @ 125 मिली/ एकड़ का स्प्रे करें|

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Symptoms of Wilt in Pea

  • विकसित कोपल एवं पत्तियों के किनारों का मुड़ना एवं पत्तियों का वेल्लित होना इस रोग को प्रथम एवं मुख्य लक्षण है ।  
  • पौधों के ऊपर के हिस्से पीले हो जाते हैं, कलिका की वृद्धि रुक जाती है, तने एवं ऊपर की पत्तियां अधिक कठोर, जड़ें भंगुर व नीचे की पत्तियां पीली होकर झड़ जाती है ।  
  • पूरा पौधा मुरझा जाता है व तना नीचे की और सिकुड़ जाता है ।

 

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Major Diseases and Their Control Measures of Wheat

गेंहू की प्रमुख बीमारियों में कण्डुआ (रस्ट) रोग प्रमुख है| कंडुआ रोग 3 प्रकार का होता है | पीला कंडुआ, भूरा कंडुआ और काला कंडुआ |

 

  • पीला कंडुआ:- यह रोग पकसीनिया स्ट्रीफोर्मियस नामक फफूंद से होता है | यह फफूंद नारंगी-पीले रंग के बीजाणु के द्वारा ग्रसित खेत से स्वस्थ खेत को प्रभावित करता है यह पत्तों की नसों की लंबाई के साथ पट्टियों में विकसित होकर छोटे-छोटे, बारीक़ धब्बे विकसित कर देता है| धीरे-धीरे यह पत्तियों की दोनों सतह पर फ़ैल जाता है| |
  • अनुकूल परिस्थितियां:- यह रोग अधिक ठण्ड और आद्र जलवायु लगभग 10-15° से.ग्रे. तापमान पर फैलता है| इस पर बने हुए पॉवडरी धब्बे 10-14 दिनों में फूट जाते है और विभिन्न माध्यमों जैसे- हवा, बरसात और सिंचाई के द्वारा एक स्थान से दूसरे स्थान पहुँचते है | इससे लगभग गेंहू की फसल में  25% हानि होती है|
  • भूरा कण्डुआ:- यह रोग पकसीनिया ट्रीटीसीनिया नामक फफूंद से होता है | यह फफूंद पत्तियों के ऊपरी सतह से शुरू होकर तनों पर लाल-नारंगी रंग के धब्बे बनता है | यह धब्बे 1.5 एम.एम.के अंडाकार आकृति के होते है|
  • अनुकूल परिस्थितियां:- यह रोग 15 -20°से.ग्रे. तापमान पर फैलता है| इसके बीजाणु विभिन्न माध्यमों जैसे- हवा,बरसात और सिंचाई के द्वारा एक स्थान से दूसरे स्थान  पहुँचते है | इसके लक्षण 10-14 दिनों में दिखने लग जाते है|
  • काला कण्डुआ:- यह रोग पकसीनिया ग्रेमिनिस नामक फफूंद से होता है | यह रोग बाजरे की फसल पर भी क्षति पहुँचाता है| यह फफूंद पौधों की पत्तियों और तनों पर लम्बे,अण्डाकार आकृति में लाल-भूरे रंग के धब्बे बनाता है| कुछ दिनों बाद यह धब्बे फट जाते है और इनमे से पाउडरी तत्त्व निकलता है जो की विभिन्न माध्यमों जैसे- सिंचाई, बरसात और हवा के द्वारा एक स्थान से दूसरे स्थान पहुँचता है और अन्य फसलों को क्षति पहुँचाता है |
  • अनुकूल परिस्थितियां:- काला कण्डुआ अन्य कण्डुआ की तुलना में अधिक तापमान 18 -30°से.ग्रे.पर फैलता है| बीजों को नमी (ओस, बारिश या सिंचाई) की आवश्यकता होती है और फसल को संक्रमित करने के लिए छह घंटे तक लगते हैं और संक्रमण के 10-20 दिनों के बाद धब्बे देखे जा सकते है|

नियंत्रण:-

  • कंडुआ रोग के नियंत्रण के लिए फसल चक्र अपनाना चाहिए|
  • रोग प्रति-रोधी किस्मों की  बुवाई करें |
  • बीज या उर्वरक उपचार बुवाई के चार सप्ताह तक कण्डुआ को नियंत्रित कर सकता है और उसके बाद इसे दबा सकता है।
  • एक ही सक्रिय घटक वाले कवकनाशी  का बार-बार उपयोग नहीं करें।
  • कासुगामीसिन 5%+कॉपर ऑक्सीक्लोरिड 45% डब्लू.पी. 320 ग्राम/एकड़ या प्रोपिकोनाज़ोल 25% ई.सी.240 ग्राम/एकड़ का छिड़काव करें|

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Weed Management in Gram

  • चने की फसल में अनेक प्रकार के खरपतवार जैसे बथुआ, खरतुआ, मोरवा, प्याजी, मोथा, दूब इत्यादि उगते हैं।

  • ये खरपतवार फसल के पौधों के साथ पोषक तत्वों, नमी, स्थान एवं प्रकाश के लिए प्रतिस्पर्धा करके उपज को प्रभावित करते हैं। इसके अतिरिक्त खरपतवारों के द्वारा फसल में अनेक प्रकार की बीमारियों एवं कीटों का भी प्रकोप होता है जो बीज की गुणवत्ता को भी प्रभावित करते हैं।

  • खरपतवारों द्वारा होने वाली हानि को रोकने के लिए समय पर नियंत्रण करना बहुत आवश्यक है। चने की फसल में दो बार गुड़ाई करना पर्याप्त होता है। प्रथम गुड़ाई फसल बुवाई के 20-25 दिन पश्चात्‌ व दूसरी 50-55 दिनों बाद करनी चाहिये।

  • यदि मजदूरों की उपलब्धता न हो तो फसल बुवाई के तुरन्त पश्चात्‌ पैन्ड़ीमैथालीन 30 ई.सी. की 2.50 लीटर मात्रा को 500 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति हेक्ट खेत में समान रूप से छिड़काव करना चाहिये। फिर बुवाई के 20-25 दिनों बाद एक गुड़ाई कर देनी चाहिये। इस प्रकार चने की फसल में खरपतवारों द्वारा होने वाली हानि की रोकथाम की जा सकती है।

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Soil Preparation and Sowing Time for Wheat

  • ग्रीष्मकालीन जुताई करें |

  • तीन वर्षों में एक बार गहरी जुताई करें |

  • 2 -3 बार कल्टीवेटर कर खेत को समतल करें |

  • बुवाई का उचित समय

  • असिंचित:- मध्य अक्टूबर से नवम्बर के प्रथम सप्ताह तक|

  • अर्धसिंचित:- नवम्बर माह का प्रथम पखवाड़ा|

  • सिंचित (समय से):- नवम्बर माह का द्वितीय पखवाड़ा|

  • सिंचित (देरी से):- दिसंबर माह का द्वितीय सप्ताह से|

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(Hindi) समृद्धि किट

 

समृद्धि किट
तकनीकी ब्रांड डोज़ लाभ
एनपीके बैक्टीरिया का कंसोर्टिया टीम बायो 3 (टीबी 3) 3 किलो/एकड़ पौधों की उत्पादक का सीधा संबंध पौधों के स्वस्थ एवं अच्छी वृद्धि से होता हैं वैसे तो हम उर्वरक के रूप में प्रमुख पोषक तत्व नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश मिट्टी में मिलाते हैं पर इन पोषक तत्वों का अधिकतम प्रतिशत पौधों को प्राप्त नही हो पाता इस प्रकार पौधे के लिए अनुपलब्ध पोषक तत्वों को उपलब्ध अवस्था में बदलने के लिए हम इन जीवाणुओं का उपयोग करते हैं
जिंक सोलूबलाइजिंग बक्टेरिया ताबा जी 4 किलो/एकड़ कई लेखो से हमें यह पता चलता हैं की भारत में अधिकतम खेती योग्य भूमि में ज़िक की कमी है या कही हैं भी तो वह उपलब्ध अवस्था में नहीं हैं जिसके कारण पौधों की वृद्धि में रुकावट होती हैं | इस कमी को पूरा करने के लिए हम ज़िंक का उपयोग करते हैं ज़िंक को पौधों के लिए उपलब्ध रूप में लाने के लिए इस जीवाणु को मिट्टी में मिलाना आवश्यक हैं|
ट्राइकोडर्मा विरीडी ट्राइको शील्ड कॉम्बैट 2 किलो/एकड़ ट्राइकोडर्मा विरिडी एक जैविक कवकनाशी है, जो मिट्टी, बीज में होने वाले रोगजनकों को मारता है, जिससे जड़ सड़न, तना गलन एवं अन्य कवक जनित रोगो से फसल की सुरक्षा होती हैं |
समुद्री शैवाल का सत् लाटू 4 किलो/एकड़ यह उत्पाद ह्यूमिक एसिड, समुद्री शैवाल ,अमीनो एसिड जैसी अनेक उत्पादो का मिश्रण है। ह्यूमिक एसिड, मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार करने के साथ ही मिट्टी की जलधारण क्षमता में सुधार करता हैं ।समुद्री शैवाल पौधों में अमीनो एसिड का निर्माण करते हैं जिससे प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया में मदद मिलती है । परिणामस्वरूप बेहतर वनस्पति विकास एवं पौधों के स्वास्थ्य में सुधार होता है।
माइकोराइजा क्रिस्टोराइजा 4 किलो/एकड़ यह पौधे की जड़ की वृद्धि और विकास में सहायक हैं | यह नाइट्रोजन, फॉस्फेट, पोटेशियम,लोहा,मैंगनीज,मैग्नीशियम,तांबा,जस्ता, बोरान, सल्फर और मोलिब्डेनम जैसे पोषक तत्वों को मिट्टी से जड़ो तक पहुंचाने का कार्य करता हैं जिससे पौधों को अधिक मात्रा में पोषक तत्व प्राप्त हो पाते हैं | फसल की प्रतिरक्षा शक्ति में वृद्धि करता हैं परिणाम स्वरूप उत्पाद की गुणवत्ता में वृद्धि होती हैं | क्योकी माइकोराइजा जड़ क्षेत्र को बढ़ाता हैं इसलिए फसल अधिक स्थान से जल भी ले पाती हैं |

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