मिरची पिकामध्ये फ्यूजेरियम विल्ट हा एक सामान्य रोग आहे. या प्रकारचे बियाणे हे मातीजन्य रोग आहे, प्रभावित झाडे अचानक कोमेजून जातात आणि हळूहळू सुकतात. अशी झाडे हाताने ओढल्यावर सहज उपटतात. फ्यूजेरियम विल्टमुळे रोगट झाडांची मुळे आतून तपकिरी व काळी पडतात. रोगग्रस्त झाडे कापली असता ऊती काळी दिसतात. झाडांची पाने कोमेजून खाली पडतात. हा रोग हवा व जमिनीतील अति आर्द्रता व उष्णतेमुळे व सिंचनाद्वारे ओलावा उपलब्ध न झाल्याने वाढतो.
जैविक व्यवस्थापन –
कॉम्बैट (ट्रायकोडर्मा विरिडी 500 ग्रॅम किंवा मोनास कर्ब (स्यूडोमोनास फ्लोरोसेंस 1% डब्ल्यूपी) 500 ग्रॅम प्रती एकर या दराने वापर करावा.
उत्पादन संदर्भ- तमिळनाडू कृषी विद्यापीठानुसार –
2 किलो कॉम्बैट (ट्राइकोडर्मा विरिडी) फॉर्म्युलेशनला 50 किलो शेणखतामध्ये चांगले मिसळा त्यानंतर त्यावर पाणी शिंपडा आणि एका पातळ पॉलिथीन शीटने झाकून ठेवा. 15 दिवसांनंतर जेव्हा ढेरवरती माय सेलियाची वाढ दिसून आली की, त्या मिश्रणाचे एक एकर या क्षेत्रामध्ये वापर करावा.
पौधो की अच्छी अंकुरण एवं जड़ विकास के लिए, मिट्टी का भुरभुरा होना आवश्यक है। पिछली फसल की कटाई के बाद एक जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करें एवं इसके बाद गोबर की खाद 4 टन + स्पीड कम्पोस्ट 4 किग्रा प्रति एकड़ के हिसाब से खेत में समान रूप से भुरकाव करें तथा 2-3 जुताई हैरो की सहायता से करें। अगर मिट्टी में नमी कम हो तो पहले पलेवा करें फिर खेत की तैयारी करें और आखिरी में पाटा चलाकर खेत समतल बना लें।
पोषक तत्व प्रबंधन
फसल बुवाई के समय या बुवाई के 25 दिन के अंदर, डीएपी 75 किलोग्राम + एमओपी 30 किलोग्राम + ट्राई कोट मैक्स (जैविक कार्बन 3%, ह्यूमिक, फुल्विक, जैविक पोषक तत्वों का एक मिश्रण) @ 4 किलोग्राम + टीबी 3 (नाइट्रोजन स्थिरीकरण बैक्टीरिया, फास्फेट घुलनशील बैक्टीरिया, और पोटेशियम गतिशील बैक्टीरिया) @ 3 किलोग्राम + ताबा जी (जिंक घुलनशील बैक्टीरिया) @ 4 किलोग्राम + नीम केक 50 किलोग्राम + एग्रोमीन ((जिंक, आयरन, मैग्नीज, कॉपर, बोरॉन और मोलिब्डेनम) @ 5 किलोग्राम + मैग्नीशियम सल्फेट @ 5 किलोग्राम इन सभी को आपस में मिलाकर एक एकड़ के हिसाब से समान रूप से भुरकाव करें।
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रोग की पहचान:- चने की फसल में यह फफूंद जनित रोग सबसे विनाशकारी साबित होता है। यह रोग किसी भी अवस्था में फसल को प्रभावित कर सकता है। इस रोग के चलते पत्तियां नीचे से ऊपर की ओर पीली और भूरी पड़ जाती हैं। अंत में पौधा मुरझाकर सूख जाता है।
तने को चीर कर देखने से आंतरिक उत्तक भूरे रंग का दिखाई देता है, जिस कारण से पोषक तत्व एवं पानी पौधों के सभी भाग तक नहीं पहुँच पाता है और पौधे मरने लगते हैं। पौधों को उखाड़ कर देखने पर कॉलर एवं जड़ क्षेत्र गहरा भूरा या काला रंग का दिखाई देता है।
रोकथाम के उपाय:- इस रोग से बचने के लिए बुवाई के समय कॉम्बैट (ट्राइकोडर्मा विरिडी 1.0% डब्ल्यू.पी.) @ 10 ग्राम प्रति किग्रा बीज के हिसाब से उपचारित करके बोना चाहिए एवं अभी इसकी रोकथाम के लिए कॉम्बैट (ट्राइकोडर्मा विरिडी 1.0% डब्ल्यू.पी.) @ 1 किग्रा प्रति एकड़ के हिसाब से मिट्टी में समान रूप से भुरकाव कर हल्की सिंचाई करें।
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बटाटा पिकामध्ये एकावेळी कमी अंतराने थोडे पाणी दिल्यास उत्पादनासाठी अधिक फायदा होतो.
पहिले पाणी लागवडीनंतर 10 दिवसांनी पण 20 दिवसांच्या आत द्यावे असे केल्याने, उगवण जलद होते आणि प्रति झाड कंदांची संख्या वाढते, ज्यामुळे उत्पादनात दुप्पट वाढ होते.
पहिले पाणी वेळेवर देऊन, शेतात टाकलेले खत पिकांना सुरुवातीपासून आवश्यकतेनुसार वापरले जाते.
जमिनीची स्थिती आणि शेतातील अनुभवानुसार दोन सिंचन बियाण्याची वेळ वाढवता किंवा कमी करता येते तथापि, दोन सिंचनांमधील अंतर 20 दिवसांपेक्षा जास्त नसावे.
खोदण्याच्या 10 दिवस आधी सिंचन थांबवा. असे केल्याने, खोदताना कंद स्वच्छ बाहेर येतील. लक्षात ठेवा, प्रत्येक सिंचनामध्ये अर्ध्या नाल्यापर्यंतच पाणी द्यावे.
वाढीच्या काही टप्प्यांमध्ये (गंभीर टप्पे) पाणी व्यवस्थापन अत्यंत महत्त्वाचे असते.
पराली जलाने से पर्यावरण को बहुत नुकसान होता है और प्रदूषण बढ़ता है।
फसल का कचरा जलाने के कारण खेत में पाए जाने वाले लाभकारी सूक्ष्मजीव नष्ट हो जाते हैं।
इससे फसलों की पैदावार कम हो जाती है और मिट्टी की उर्वरता में कमी आती है।
पराली जलाने कारण वातावरण में मीथेन, कार्बन मोनो ऑक्साइड, कार्बन डाइऑक्साइड आदि जैसे गैसों का काफी उत्सर्ज़न होता है जिसके कारण वायुमंडल में कोहरा सा छा जाता है।
पराली जलाने के कारण मिट्टी में कार्बनिक पदार्थो की सरचना गड़बड़ा जाती है।
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जौ की खेती में अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए इसके बीजों की बुआई का सबसे उपयुक्त समय 15 अक्टूबर से 15 नवंबर है। हालांकि परिस्थिति एवं चारे की आपूर्ति के अनुसार इसकी बुआई दिसंबर के प्रथम सप्ताह तक भी की जा सकती है।
कम तापमान के कारण बुआई में देरी से अंकुरण देर से होता है। इसे हल या सीड ड्रिल से 25 सेमी की दूरी पर पंक्तियों में बोना चाहिए।
बीज को 4 से 5 सेमी की गहराई पर बोना चाहिए। कतारों में बोई गई फसल में खरपतवारों पर आसानी से नियंत्रण किया जा सकता है। बुआई से पहले बीजों को कार्बेन्डाजिम 12% + मैंकोजेब 63% (करमानोवा) @ 2.5 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करने से अंकुरण अच्छा होता है और फसल बीज जनित रोगों से मुक्त रहती है।
चारे के लिए बोई जाने वाली फसल के लिए 100 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर बोना चाहिए। लेकिन अनाज के लिए प्रति हेक्टेयर 80 किलोग्राम बीज की ही आवश्यकता होती है।
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मेथी की खेती सभी प्रकार की मिट्टी में की जा सकती है बशर्ते मिट्टी में कार्बनिक पदार्थ उच्च मात्रा में जरूर हो। हालाँकि यह अच्छे निकास वाली बालुई और रेतली बालुई मिट्टी में अच्छे परिणाम देती है। यह मिट्टी की 5.3 से 8.2 पी एच मान को सहन कर सकती है।
बात इसके बीज दर की मात्रा की करें तो एक एकड़ खेत में बिजाई के लिए 12 किलोग्राम प्रति एकड़ बीजों का प्रयोग करना चाहिए।
इसके खेत की तैयारी के लिए मिट्टी के भुरभुरा होने तक खेत की दो से तीन बार जुताई करें और फिर ज़मीन को समतल कर लें। आखिरी जुताई के समय 10 से 15 टन प्रति एकड़ अच्छी तरह से गली हुई गोबर की खाद डालें। बिजाई के लिए 3×2 मीटर समतल बीज बैड तैयार करें।
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