सोयाबीन की फसल में तना मक्खी प्रकोप का ऐसे करें निदान

This is how to diagnose stem fly infestation in soybean crop
  • इस कीट की मैगट सफेद रंग के तने के अंदर रहती हैं। व्यस्क कीट चमकीले काले रंग का दो मिलीमीटर आकार के होते हैं।

  • इस कीट की मादा पत्तियों पर पीले रंग के अंडे देती हैं जिनसे मैगट निकलकर पत्तियों की शिराओं में छेद कर सुरंग बनाती हुई तने में प्रवेश करती है तथा तने को खोखला कर देती हैं।

  • इसके कारण पौधे की पत्तियां शुरूआती अवस्था में पीली दिखाई देने लगती हैं और बाद में पूरा पौधा पीला पड़ जाता है।

  • तना मक्खी से बचाव के लिए नोवालक्सम (लेम्बडासाइलोथ्रिन 9.5% + थायोमिथाक्सॉम 12.9 प्रतिशत ZC) 50 मिली प्रति एकड़ या कवर (क्लोरएन्ट्रानिलीप्रोल 18.5% SC) 60 मिली प्रति एकड़ का उपयोग करें।

आधुनिक और स्मार्ट खेती से जुड़ी ऐसी ही महत्वपूर्ण जानकारियों के लिए पढ़ते रहे ग्रामोफ़ोन के लेख। इस लेख को नीचे दिए गए शेयर बटन से अपने किसान मित्रों से भी करें साझा।

Share

कापूस पिकामध्ये पांढऱ्या माशीचे नियंत्रण कसे करावे?

Identify and control whitefly infestation in cotton
  • या किडीचे अप्सरा (लहान मुले) आणि प्रौढ झाडाची फळे शोषतात आणि तिचा विकास थांबवतात हे कीटक बाल्याअवस्थेत आणि प्रौढ अवस्थेत दोन्ही कापूस पिकाचे मोठ्या प्रमाणात नुकसान करतात.

  • या कीटकातून उत्सर्जित होणारा “मधुरस” काळ्या बुरशीच्या वाढीस मदत करतो. तीव्र बाधा झाल्यास संपूर्ण कापसाचे पीक काळे पडते व पाने जळलेली दिसतात.

  • कधीकधी पीक पूर्ण विकसित झाल्यानंतरही या किडीचा प्रादुर्भाव झाल्याने कापूस पिकाची पाने कोरडे पडतात व खाली पडतात. विषाणूजन्य पर्णासंबंधी रोगाचा प्रसार होण्यासही या किडीचा महत्त्वाचा वाटा आहे.

  • रासायनिक प्रबंधन: या कीटकांच्या नियंत्रणासाठी  डायफैनथीयुरॉन 50% डब्ल्यूपी 250 ग्रॅम / एकर किंवा  फ्लोनिकामिड 50% डब्ल्यूजी 60 मिली / एकर किंवा  एसिटामिप्रीड 20% एसपी 100 ग्रॅम / एकर किंवा पायरीप्रोक्सीफैन 10% + बॉयफैनथ्रिन 10% ईसी 250 मिली / एकर दराने फवारणी करावी.

  • जैविक व्यवस्थापन: या किडीच्या नियंत्रणासाठी  बवेरिया बेसियाना 500 ग्रॅम प्रति एकर फवारणी करावी.

Share

कापूस पिकामध्ये हिरव्या तेलाची समस्या आणि नियंत्रणाचे उपाय

Jassid problem and control measures in cotton crop

नुकसानीची लक्षणे –

या किटकांचे शिशु आणि प्रौढ दोघेही पिकाचे नुकसान करतात. यासोबतच हे कीटक वनस्पतींचे देठ, पाने आणि फुले यांचे रस शोषून झाडांच्या वाढीस प्रतिबंध करतात, त्यामुळे झाडे कमकुवत, लहान व बौने राहतात व उत्पादनात घट येते व या किडीने रस शोषल्याने पाने आकुंचन पावतात व जास्त प्रादुर्भाव होऊन झाड मरते.

नियंत्रणाचे उपाय –

शेतकरी बंधू, कीटकांच्या प्रादुर्भावाची तक्रार करण्यासाठी, पिवळे चिपचिपे ट्रैप (येलो स्टिकी ट्रैप) 8 ते 10 प्रती एकर या दराने शेतामध्ये स्थापन करा. 

जैविक नियंत्रणासाठी, ब्रिगेड बी (बवेरिया बेसियाना 1.15% डब्ल्यूबी) 1 किग्रॅ/एकर 150 – 200 लिटर पाण्याच्या दराने फवारणी करावी.

या किटकांच्या नियंत्रणासाठी, मीडिया (इमिडाक्लोप्रिड 17.8% एसएल) 50 मिली किंवा थियामिथोक्साम 25% डब्ल्यूजी 40 ग्रॅम किंवा लांसर गोल्ड (ऐसीफेट 50% + इमिडाक्लोप्रिड 1.8% एसपी) 400 ग्रॅम + (सिलिको मैक्स) 50 मिली प्रती एकर 150 – 200 लिटर पाण्याच्या दराने फवारणी करावी.

Share

जैविक कीटनाशक मेटाराइजियम एनिसोप्ली के उपयोग से मिलेंगे कई फायदा

Uses of the biological insecticide Metarhizium anisopliae

मेटाराइजियम एनिसोप्ली एक फफूंद पर आधारित जैविक कीटनाशक है। यह मिट्टी में स्वतंत्र रूप से पाया जाता है एवं सामान्यतयः कीटों में परजीवी के रूप में पाया जाता है।

जब मेटाराइजियम एनीसोप्ली के बीजाणु लक्ष्य कीट के संपर्क में आते हैं, तो उनके आवरण से चिपक जाते हैं एवं उचित तापमान और आर्द्रता होने पर बीजाणु अंकुरित हो जाते हैं। इनकी अंकुरण नलिका कीटों के श्वसन छिद्रों (स्पायरेक्लिस), संवेदी अंगों और अन्य कोमल भागों से कीटों के शरीर में प्रवेश कर जाती है।

यह कवक कीटों के संपूर्ण शरीर में कवक जाल बनाकर कीट के शारीरिक भोजन पदार्थों को अवशोषित करके खुद की वृद्धि कर लेता है। मेटाराइजियम एनीसोप्ली 50 प्रतिशत से कम नमी पर भी बीजाणु उत्पन्न कर लेते हैं। इसके कारण यह सभी परिस्थितियों में काम करता है।

मेटाराइजियम एनीसोप्ली का प्रयोग सफेद लट (बीटल), ग्रब्स, दीमक, सुन्डियों, सेमीलूपर, कटवर्म, मिलीबग और माहू आदि के रोकथाम के लिए किया जाता है।

प्रयोग की विधि:

  • मिट्टी से प्रयोग के लिए मेटाराइजियम एनिसोप्ली की 1 किलो प्रति एकड़ के दर से लगभग 75 किलो गोबर की खाद में मिलाकर अंतिम जुताई के समय प्रयोग करना चाहिए।

  • खड़ी फसल में कीट के नियंत्रण के लिए 1 किलो प्रति एकड़ की दर से 400-500 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें। 

कृषि क्षेत्र एवं किसानों से सम्बंधित ऐसी ही महत्वपूर्ण जानकारियों के लिए ग्रामोफ़ोन के लेख प्रतिदिन जरूर पढ़ें। आज की जानकारी पसंद आई हो तो इसे  शेयर करना ना भूलें।

Share

टमाटर के फसल में फल फटने के कारण एवं बचाव के उपाय

Causes and diagnosis of fruit cracking in tomato crop

टमाटर की फसल में फलों का फटना एक भौतिक विकार होता है, और यह अक्सर परिपक्वता के समय दिखाई देता है। इस विकार में फल दो प्रकार से फटते हैं, एक लंबवत और दूसरा गोलाकार। 

टमाटर की फसल में फल का फटना मुख्यतः दो कारण से होता है, पहला कारण फसल में अनियमित सिंचाई करना जैसे जमीन ज्यादा समय तक सूखी है और अचानक से भारी सिंचाई कर दिया जाए और दूसरा कारण भूमि में बोरोन नामक तत्व की कमी होना है।

फल फटने की रोकथाम: इस समस्या के बचने के लिए फसल में समय समय पर संतुलित प्रमाण में सिंचाई करें, तथा बोरोन पोषक तत्व की पूर्ति के लिए रिच बोर (बोरोन 20%) @ 1-1.5 ग्राम प्रति लीटर पानी के दर से छिड़काव करें या रिच बोरामिन-सीए (अमीनो एसिड, बोरान, कैल्शियम) @ 2-3 मिली प्रति लीटर पानी के दर से छिड़काव करें। 

कृषि क्षेत्र एवं किसानों से सम्बंधित ऐसी ही महत्वपूर्ण जानकारियों के लिए ग्रामोफ़ोन के लेख प्रतिदिन जरूर पढ़ें। आज की जानकारी पसंद आई हो तो इसे  शेयर करना ना भूलें।

Share

तरबूज की फसल में माहू कीट के लक्षण एवं नियंत्रण के उपाय

Symptoms and control of aphids in watermelon crop

यह कीट पत्तियों को एवं कोमल टहनियों को प्रभावित करते हैं, जिसके कारण पत्तियां मुड़कर मुरझाने लगती है। पौधों का विकास रुक जाता है साथ ही कीट से मधुरस उत्सर्जन के कारण पत्तियों पर काली फफूंद का विकास होता है।

नियंत्रण: इस कीट के नियंत्रण के लिए प्रकोप दिखाई देते ही नोवासेटा (एसिटामिप्रिड 20% एसपी) @ 30 ग्राम प्रति एकड़ या मीडिया (इमिडाक्लोप्रिड 17.8% एस एल) @ 40-50 मिली प्रति एकड़ + नोवामैक्स (जिबरेलिक ऍसिड 0.001%) @ 300 मिली के दर से 150-200 लीटर पानी में छिड़काव करें। 

कृषि क्षेत्र एवं किसानों से सम्बंधित ऐसी ही महत्वपूर्ण जानकारियों के लिए ग्रामोफ़ोन के लेख प्रतिदिन जरूर पढ़ें। आज की जानकारी पसंद आई हो तो इसे  शेयर करना ना भूलें।

Share

जानिए लौकी की फसल में छोटे फल गिरने के कारण एवं बचाव के उपाय

Know the reasons and prevention measure for small fruits dropping in gourd crop

लौकी की खेती करने वाले किसानों के सामने अक्सर लौकी की फसल छोटे फल पीले होने की एवं सूख कर गिरने की समस्या आती है, और इससे उपज में भारी नुकसान होता है। 

क्यों गिरते हैं लौकी के छोटे फल?

  • पौधों में फफूंद जनित रोग होने पर फल गिरने लगते हैं।

  • फसल में कीटों का प्रकोप होने पर भी यह समस्या हो सकती है।

  • फसल में अनियमित सिंचाई या सिंचाई की कमी होने पर भी लौकी के छोटे फल गिरने लगते हैं।

  • असंतुलित मात्रा में, उर्वरकों का प्रयोग होने के कारण से भी फल गिरते हैं।

  • परागण सही नहीं होने की वजह से भी छोटे फल गिरने लगते हैं।

छोटे फलों के गिरने के शुरूआती लक्षण:

शुरूआती अवस्था में छोटे फलों के साथ लगे फूल सूखने लगते हैं और धीरे-धीरे छोटे फल पीले एवं भूरे रंग के होने लगते हैं। बाद में फल पूरी तरह सूख कर गिरने लगते हैं।

रोकथाम:

  • समय-समय पर फसल का निरीक्षण करें।

  • खेत में जल निकासी की उचित व्यवस्था करें।

  • आवश्यकता से अधिक सिंचाई एवं उर्वरकों का प्रयोग न करें।

  • यदि फफूंद जनित रोग या फल मक्खी एवं रस चूसक कीटों के लक्षण दिखाई दे तो नियंत्रण के लिए उचित छिड़काव करें।

कृषि क्षेत्र एवं किसानों से सम्बंधित ऐसी ही महत्वपूर्ण जानकारियों के लिए ग्रामोफ़ोन के लेख प्रतिदिन जरूर पढ़ें। आज की जानकारी पसंद आई हो तो इसे शेयर करना ना भूलें।

Share

बैंगन की फसल में रस चूसक कीटों के लक्षण एवं नियंत्रण के उपाय

Symptoms and control measures of sucking pests in brinjal crop
  • रस चूसक कीट ‘मकड़ी’ बैंगन की फसल में पत्तों के नीचे जाल फ़ैलाते हैं और पत्तों का रस चूसते हैं। इससे पत्ते लाल रंग के दिखने लगते हैं। 

  • इससे बचाव के लिए तुस्क (मॅलॅथिऑन 50.00% ईसी) @ 600 मिली/एकड़ या मेओथ्रिन  (फेनप्रोपॅथ्रीन 30 % ईसी) @ 100 – 136 मिली प्रति एकड़ के दर से 150 -200 लीटर पानी में मिलकर छिड़काव करें। 

  • रस चूसक कीट जैसिड’ पत्तियों की निचली सतह से रस चूसते हैं, जिसके प्रभाव से पत्तियां पीली होकर कमजोर पड़ जाती हैं।  

  • सोलोमन (बीटा-सायफ्लुथ्रिन 08.49% + इमिडाक्लोप्रिड 19.81 % w/w ओडी) @ 70 -80 मिली प्रति एकड़ या टफगोर (डायमेथोएट 30% ईसी) @ 792 मिली प्रति एकड़ के दर के 150 – 200 लीटर पानी में छिड़काव करें।  

  • रस चूसक कीट सफ़ेद मक्खी’ पत्तियों से रस चूसती हैं, जिससे पत्तियां सिकुड़ जाती हैं। इसके अलावा यह कीट विषाणु जन्य रोगों को एक पौधे से दूसरे पौधों में फैलाने का काम भी करते हैं।

  • पेजर (डायफेंथियूरॉन 50% डब्लूपी) @ 240 ग्राम/एकड़ और अरेवा (थायोमिथाक्साम 25% डब्लूजी) @ 80 ग्राम प्रति एकड़ के दर से 150 – 200 लीटर पानी में छिड़काव करें। 

  • रस चूसक कीट माहू’ छोटे एवं हरे रंग के होते हैं, ये पत्तियों की निचली सतह पर रहते हैं और रस चूसते हैं  जिसके कारण पत्तिया पीली पड़ती है| 

  • सोलोमन (बीटा-सायफ्लुथ्रिन 08.49% + इमिडाक्लोप्रिड 19.81% w/w ओडी) @ 70 -80 मिली प्रति एकड़ के दर से 150 से 200 लीटर पानी में मिलकर छिड़काव करें। 

कृषि क्षेत्र एवं किसानों से सम्बंधित ऐसी ही महत्वपूर्ण जानकारियों के लिए ग्रामोफ़ोन के लेख प्रतिदिन जरूर पढ़ें। आज की जानकारी पसंद आई हो तो इसे  शेयर करना ना भूलें।

Share

तरबूज में पाउडरी मिल्ड्यू रोग के लक्षण एवं नियंत्रण के उपाय

Symptoms and control of powdery mildew disease in watermelon

इस रोग से पौधों के ऊपरी पत्ते, तने और नए बढ़ते भागों पर सफेद चूर्ण का विकास होता है, और जैसे ही संक्रमण बढ़ता है संपूर्ण पत्ते कवक के ढक जाते हैं। ग्रासित पौधों की पत्तियां समय से पहले झड़ने लगती हैं। अगर संक्रमण फल अवस्था के समय हो तो फल अविकसित रह जाते हैं एवं विकृत हो जाते हैं।

नियंत्रण: इस रोग के नियंत्रण के लिए रोग के लक्षण दिखाई देते ही नोवाकोन (हेक्साकोनाज़ोल 5% एससी) @ 400 मिली प्रति एकड़ के दर से 150-200 लीटर पानी में छिड़काव करें। साथ हीं अच्छे फूल एवं फल विकास के लिए न्युट्रीफुल मैक्स (फुलविक एसिड + एमिनो एसिड+ ट्रेस घटक) @ 250 मिली प्रति एकड़ से छिड़काव करें।

कृषि क्षेत्र एवं किसानों से सम्बंधित ऐसी ही महत्वपूर्ण जानकारियों के लिए ग्रामोफ़ोन के लेख प्रतिदिन जरूर पढ़ें। आज की जानकारी पसंद आई हो तो इसे  शेयर करना ना भूलें।

Share

प्याज़ में बेसल रॉट की समस्या के लक्षण एवं निवारण के उपाय

Symptoms and prevention of basal rot problem in onions

इस रोग के प्रारंभिक लक्षण में पीली पड़ती पत्तियां नजर आती हैं एवं पौधों की वृद्धि रुक जाती है, और बाद में पत्तियां सिरे से नीचे की ओर सूख जाती हैं। संक्रमण की शुरूआती अवस्था में पौधों की जड़ गुलाबी रंग की हो जाती है और बाद में सड़ने लगती है। जैसे ही संक्रमण बढ़ता है, कंद निचले सिरे से सड़ने लगता है और अंत में पूरा पौधा मर जाता है।

निवारण: इसके नियंत्रण के लिए, रोग के लक्षण दिखाई देते ही धानुकॉप (कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 50% डब्ल्यूपी) @ 500 ग्राम प्रति एकड़ 200 लीटर पानी के दर से ड्रेंचिंग करें।

कृषि क्षेत्र एवं किसानों से सम्बंधित ऐसी ही महत्वपूर्ण जानकारियों के लिए ग्रामोफ़ोन के लेख प्रतिदिन जरूर पढ़ें। आज की जानकारी पसंद आई हो तो इसे शेयर करना ना भूलें।

Share