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मेट्राझियम अनीसोप्लिया एक अतिशय उपयुक्त जैविक नियंत्रण आहे.
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हुमणी, वाळवी, नाकतोडे, हॉपर्स, लोकरी मावा, भुंगे आणि बीटल इत्यादीं सुमारे 300 प्रजाती विरूद्ध कीटकनाशक म्हणून याचा वापर केला जातो.
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1 किलो मेटारिझियम ॲनिसोप्लिआ / एकरी घ्या आणि हे 50 ते 100 किलो चांगले विघटित करुन एफवायएममध्ये मिसळा आणि ते एका मोकळ्या शेतात प्रसारित करा.
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या बुरशीचे काही बीज पुरेसा ओलावा असलेल्या किडीच्या शरीरावर अंकुरतात.
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ही बुरशी यजमान कीटकांचे (होस्ट सेलचे) शरीर खातो.
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हे उभ्या पिकांमध्ये फवारणी म्हणूनदेखील वापरले जाऊ शकते.
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त्याचा वापर करण्यापूर्वी शेतात आवश्यक आर्द्रता असणे फार महत्वाचे आहे.
टमाटर के खेत में कैल्शियम की कमी दूर करने के लिए मिट्टी उपचार
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कैल्शियम की कमी के कारण टमाटर की फसल को होने वाले नुकसान से बचाने के लिए बुआई के पहले ही प्रबंधन के उपाय किये जाने चाहिए।
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इसके लिए रोपाई के 15 दिन पहले मुख्य खेत में अच्छे से पकी हुई या सड़ी हुई गोबर की खाद का उपयोग करें।
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इसके पश्चात रोपाई के पहले कैल्शियम नाइट्रेट @ 10 किलो/एकड़ की दर से खेत में मिलाएँ।
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कैल्शियम की कमी के लक्षण दिखाई देने पर कैल्शियम EDTA @ 150 ग्राम/एकड़ की दर से दो बार छिड़काव करें।
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बेमिसाल मजबूती वाले HyTarp तिरपाल की विशेषताएं
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यह तिरपाल पूरी तरह से वर्जिन प्लास्टिक से बनी है और इसमें मिट्टी या फिलर का कंटेंट नहीं है।
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इस तिरपाल की मोटाई 200 GSM होने के साथ ये 3 लेयर बनी की है जिसकी वजह से तिरपाल काफी मजबूत और टिकाऊ है।
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ये तिरपाल UV ट्रीटेड भी है जीसकी वजह से कड़ी धूप, ठंढ और बारीश में भी ये तिरपाल लंबे समय तक चलती है।
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ये तिरपाल एक साईड से आर्मी ग्रीन और दूसरे साईड से ब्लैक कलर की है।
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इस तिरपाल मे चारों बाजू में विशिष्ट अंतर छोड के अल्युमिनियम के आय लेट्स दिये गए हैं जो तिरपाल को रस्सी से बाँधने मे काम आयेंगे।
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यह तिरपाल सभी रेग्युलर साईज 11×15, 15×18, 21×30, 24×36, 30×30 में उपलब्ध है।
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कांद्याच्या रोपवाटिकेत बुरशीजन्य आजाराचे नियंत्रण
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खरीप हंगामात पावसामुळे जास्त आर्द्रता आणि मध्यम तापमान हे बुरशीजन्य आजाराच्या विकासाचे मुख्य घटक आहेत.
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कांद्याची रोपवाटिकेत मर रोग, मूळकूज, स्टेम रॉट, पाने पिवळी पडणे इत्यादी रोगांचा प्रादुर्भाव दिसून येतो.
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या रोगांमध्ये रोगजनक प्रथम वनस्पतीच्या कॉलर भागांंवर हल्ला करतो.
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शेवटी, कॉलर भाग आणि मुळे कलंकित होतात, ज्यामुळे झाडे कोसळतात आणि मरतात.
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बुरशीजन्य रोग रोखण्यासाठी पेरणीच्या वेळी निरोगी बियाणे निवडावे.
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कार्बेन्डाझिम 12% + मॅन्कोझेब 63% 30 ग्रॅम / पंप किंवा थायोफिनेट मेथाईल 70% डब्ल्यू / डब्ल्यू, 50 ग्रॅम / पंप किंवा मॅन्कोझेब 64% + मेटॅलॅक्साइल 8% डब्ल्यू.पी. 60 ग्रॅम / पंप दराने फवारणी करावी.
सरसों की बुआई करते समय इन बातों का रखें ध्यान
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सरसों की बुआई का सबसे अच्छा समय 5 से 25 अक्टूबर के बीच होता है।
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इस समय सरसों की बुआई करने से अच्छा उत्पादन मिलता है, इसलिए किसानों को 25 अक्टूबर तक सरसों की बुआई कर देनी चाहिए।
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सरसों की बुआई के लिए किसानों को एक एकड़ खेत में 1 किलो बीज का प्रयोग करना चाहिए।
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सरसों को कतारों में बोना चाहिए ताकि निराई करने में आसानी हो।
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सरसों की बुआई देसी हल या सीड ड्रिल से करनी चाहिए।
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इसमें पंक्ति से पंक्ति की दूरी 30 सेमी तथा पौधे से पौधे की दूरी 10-12 सेमी रखा जाना चाहिए।
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सरसों की बुआई करते समय इस बात का ध्यान रखें कि बीज 2-3 सेमी की गहराई में लगाई गई हो।
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100 सेमी से अधिक गहराई पर बीज नहीं बोना चाहिए क्योंकि अधिक गहराई पर बीज बोने से बीज के अंकुरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
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मटर की बुवाई के 15 दिनों में जरूर करें ये पोषण प्रबंधन
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जिस प्रकार मटर की बुआई के समय पोषण प्रबंधन किया जाता है ठीक उसी प्रकार बुआई के 15 दिनों में भी पोषण प्रबंधन किया जाना बहुत आवश्यक होता है।
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बुआई के 15 दिनों में पोषण प्रबंधन करने से मटर की फसल को बहुत अच्छी शुरुआत मिलती है।
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यह पोषण प्रबंधन मटर की फसल को कवक व कीट जनित रोगों एवं पोषण की कमी के प्रति प्रतिरोधक क्षमता प्रदान करने में सहायता प्रदान करता है।
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इस समय पोषण प्रबंधन करने के लिए सल्फर 90% @ 5 किलो/एकड़ + जिंक सल्फ़ेट @ 5 किलो/एकड़ की दर से मिट्टी उपचार के रूप में उपयोग करें।
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यह भी ध्यान रखें की पोषण प्रबंधन के समय खेत में पर्याप्त नमी जरूर होनी चाहिए।
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प्याज की नर्सरी के लिए जरूरी छिड़काव प्रबंधन
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प्याज़ की नर्सरी की बुआई के सात दिनों के अंदर छिड़काव प्रबंधन करना बहुत आवश्यक होता है।
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यह छिड़काव कवक जनित बीमारियों एवं कीटों के नियंत्रण एवं पोषण प्रबंधन लिए किया जाता है।
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इस समय छिड़काव करने से प्याज़ की नर्सरी को अच्छी शुरुआत मिलती है।
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कवक जनित रोगो लिए करमानोवा (कार्बेन्डाजिम 12% + मैन्कोजेब 63% WP) @ 30 ग्राम/पंप की दर से छिड़काव करें।
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कीट प्रबंधन के लिए थियानोवा (थियामेथोक्साम 25% WG) @10 ग्राम/पंप की दर से छिड़काव करें।
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पोषण प्रबंधन के लिए (मैक्सरूट) ह्यूमिक एसिड @ 10 ग्राम/पंप की दर से छिड़काव करें।
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प्याज की नर्सरी के लिए ऐसे करें बेड की तैयारी
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नर्सरी बेड के लिए खेत को तैयार करने में मोल्डबोर्ड हल से गहरी जुताई करनी चाहिए और मिट्टी के ढेलों को कल्टीवेटर से 2-3 बार तोड़ना चाहिए।
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नर्सरी बेड तैयार करने से पहले पिछली फसल के अवशेष, खरपतवार और पत्थरों को हटा देना चाहिए।
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आसान सिंचाई के लिए नर्सरी क्षेत्र को जल स्रोत के नजदीक तैयार करना चाहिए।
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एक हेक्टेयर खेत में रोपाई के लिए लगभग 0.05 हेक्टेयर नर्सरी क्षेत्र की आवश्यकता होती है।
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अंतिम जुताई के समय 500 किलोग्राम अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद (FYM) और 1.25 किलोग्राम ट्राइकोडर्मा विरिडी मिलाकर मिट्टी में अच्छी तरह मिलाएं।
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बेड पूर्व एवं पश्चिम दिशा में तैयार करना चाहिए तथा बेड पर लाइन उत्तर से दक्षिण की ओर बनानी चाहिए।
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लहसुन की फसल के लिए ऐसे करें खेत की तैयारी
लहसुन के खेती के लिए अच्छी जल निकासी वाली भुरभुरी मिट्टी, जिसमें ऑर्गेनिक कार्बन अधिक मात्रा में हो, जिसका pH स्तर 6-7 हो आदर्श मानी जाती है। अत्यधिक अम्लीय एवं भारी मिट्टी इस फसल के लिए उपयुक्त नहीं होती है। लहसुन की बुवाई का इष्टतम समय सितंबर से अक्टूबर तक होता है।
खेत की तैयारी के लिए पिछली फसल की कटाई के बाद खेत में एक जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से तथा 2-3 जुताई हैरो की सहायता से करें। अगर मिट्टी में नमी कम हो तो पहले पलेवा करें फिर खेत की तैयारी करें और आखिर में पाटा चला कर खेत समतल बना लें। पौधे से पौधे की दूरी एवं पंक्ति से पंक्ति की दूरी 10 से 15 सेंटीमीटर रखें। बीजदर 5-6 क्विंटल/हेक्टेयर की दर से रखें।
उर्वरक और अन्य पोषक तत्व प्रबंधन के लिए यूरिया- 20 किलो + एसएसपी- 50 किलो + डीएपी- 30 किलो + एमओपी- 40 किलो + समुद्री शैवाल, अमीनो, ह्यूमिक (ट्राई-कोट मैक्स) 4 किग्रा + एनपीके कंसोर्टिया (टीबी 3) 3 किलो + जिंक सोल्यूब्लाज़िंग बैक्टेरिया (ताबा G) 4 किलो + फिपनोवा जीआर (FIPRONIL 0.6%)@ 4 किग्रा + सूक्ष्म पोषक मिश्रण (एग्रोमीन) 5 किलो + मैग्नीशियम सल्फेट 5 किग्रा प्रति एकड़ का उपयोग करें।
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अमरूद में उकठा रोग के लक्षणों को पहचाने व करें जल्द नियंत्रण
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उकठा रोग के कारण अमरूद की पत्तियों का रंग हल्का पीला हो जाता है साथ ही साथ इसकी शीर्ष शाखाओं की पत्तियाँ घुमावदार होकर मुड़ जाती हैं। पत्तियां पीली से लाल में बदल जाती हैं और समय से पहले झड़ जाती हैं। इसके कारण नई पत्तियों का निर्माण नहीं हो पाता है एवं टहनियाँ खाली हो जाती हैं और अंत में सूख जाती हैं।
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इस रोग के नियंत्रण के लिए ट्राइकोडर्मा विरिडी 5 -10 ग्राम या स्यूडोमोनास फ्लोरोसेंस 2.5-5 ग्राम प्रति 5 किलो की दर से गोबर की खाद में मिलाकर, पौधा लगाते समय तथा 10 किलोग्राम प्रति गढ्ढा या पुराने पौधों में गुड़ाई कर के डालें।
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ट्राइकोडर्मा विरिडी 5-10 ग्राम या स्यूडोमोनास फ्लोरोसेंस 2.5-5 ग्राम प्रति लीटर पानी में मिलाकर पौधे पर छिड़काव करें।
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अमरूद के पौधे के चारों ओर थाले बनाएं और उसमें कार्बेन्डाजिम 45% WP @ 2 ग्राम/लीटर पानी या कॉपर हाइड्रॉक्साइड 50% WP @ 2.5 ग्राम/लीटर पानी में घोल कर उससे थाले में ड्रेंचिंग करें।
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