जानिए कैसे बचाएं मकड़ी के प्रकोप से मिर्च की फसल!

Know how to save chilli crop from mite attack

इस कीट के नवजात और वयस्क दोनों अवस्थाएं नई पत्तियों को निचली सतह से और पौधों के बढ़ते सिरों से रस चूसते हैं। इसके कारण, पत्तियां नीचे की ओर मुड़कर सिकुड़ जाती हैं, एवं उलटे नाव के आकार का रूप ले लेती हैं। संक्रमित पौधे के फल छोटे रह जाते हैं। 

रोकथाम- इन कीटों का प्रकोप दिखाई देते ही बचाव के लिए, ओमाइट (प्रोपरजाइट 57% ईसी)  @ 600 मिली प्रति एकड़ या पेजर (डायफेंथियूरॉन 50% डब्लूपी) @ 240 ग्राम प्रति एकड़ या इमानोवा (इमामेक्टिन बेंजोएट 05 % एसजी) @ 80 ग्राम प्रति एकड़ के दर से 150 -200 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें। 

कृषि क्षेत्र एवं किसानों से सम्बंधित ऐसी ही महत्वपूर्ण जानकारियों के लिए ग्रामोफ़ोन के लेख प्रतिदिन जरूर पढ़ें। आज की जानकारी पसंद आई हो तो इसे  शेयर करना ना भूलें।

Share

सब्जियों वाली फसल में ऐसे करे खरपतवार प्रबंधन

How to do weed management in vegetable crop

सब्जियों वाली फसलों में खरपतवारों को यदि उचित समय पर नियंत्रित नहीं किया जाए तो यह सब्जियों की उपज एवं गुणवत्ता को बुरी तरह प्रभावित करते हैं। खरपतवार न केवल उपज कम करते हैं बल्कि सब्जियों के बीजों के साथ अगर खरपतवारों के बीज मिल गए तो बीज की गुणवत्ता को भी खराब कर देते हैं, जिससे उनका मूल्य प्रभावित होता है। ज्यादातर सब्जी वाली फसलों में शुरूआती अवस्था में खरपतवारों के प्रकोप से बचाना अति आवश्यक होता है, क्योंकि इस समय हुआ नुकसान फसल की बढ़वार एवं उत्पादन दोनों को प्रभावित करता है।

खरपतवार प्रबंधन: 

  • फसल की बुआई करते समय खरपतवार मुक्त शुद्ध एवं प्रमाणित बीज/पौध का प्रयोग करें।

  • पूर्ण रूप से सड़ी गोबर व कम्पोस्ट खाद का ही प्रयोग करें अन्यथा सबसे ज्यादा मात्रा में खरपतवार के बीज खेत में आने की संभावना इसी से ही रहती है।

  • कृषि यंत्रों को लगी मिट्टी एक खेत से दूसरे खेत में प्रयोग करने से पहले साफ़ जरूर कर लें।

  • नर्सरी के स्थान को खरपतवार मुक्त रखें।

  • खेत के आस-पास की मेड़, पानी के स्त्रोत व नालियों को खरपतवार मुक्त रखें।

कृषि क्षेत्र एवं किसानों से सम्बंधित ऐसी ही महत्वपूर्ण जानकारियों के लिए ग्रामोफ़ोन के लेख प्रतिदिन जरूर पढ़ें। आज की जानकारी पसंद आई हो तो इसे  शेयर करना ना भूलें।

Share

भिंडी की फसल में सर्कोस्पोरा पत्ती धब्बा रोग के लक्षण व नियंत्रण के उपाय

Symptoms and control measures of Cercospora leaf spot disease in okra crop

यह रोग सर्कोस्पोरा मालाएंसिस नामक फफूंद के कारण होता है। इस रोग से प्रभावित पौधों की पत्तियों पर कोणीय से लेकर अनियमित भूरे धब्बे बनते हैं। अधिक संक्रमण की स्थिति में यह धब्बे पूरी पत्तियों पर फ़ैल जाते हैं, और पत्तियां मुरझाने लगती है जिसके कारण प्रभावित पत्तियाँ जल्दी ही झड़ने लगती हैं।

नियंत्रण के उपाय: ब्लू कॉपर (कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 50% डब्लूपी) @ 1 किलो प्रति एकड़ या इंडोफिल जेड 78 (झायनेब 75% डब्लूपी) @ 600-800 ग्राम प्रति एकड़ + सिलिकोमैक्स गोल्ड @ 50 मिली + नोवामैक्स (जिबरेलिक एसिड 0. 001%) @ 300 मिली प्रति एकड़ के दर से 150 से 200 लीटर पानी में मिलकर छिड़काव करें।

कृषि क्षेत्र एवं किसानों से सम्बंधित ऐसी ही महत्वपूर्ण जानकारियों के लिए ग्रामोफ़ोन के लेख प्रतिदिन जरूर पढ़ें। आज की जानकारी पसंद आई हो तो इसे  शेयर करना ना भूलें।

Share

लौकी की फसल में डाउनी मिल्ड्यू रोग की पहचान एवं नियंत्रण के उपाय

Identification and control of downy mildew disease in bottle gourd crop

लौकी के पौधे में डाउनी मिल्ड्यू की समस्या पानी की अनियमितता और जमीन में नमी की मात्रा के कारण होता है। डाउनी मिल्ड्यू लौकी के पौधे में होने वाला एक गंभीर रोग है, जो स्यूडो पेरोनोस्पोरा क्यूबेंसिस नामक कवक के कारण होता है। यह रोग पौधों को किसी भी अवस्था में प्रभावित कर सकता है। इस रोग में पत्तियों पर भूरे व पीले रंग के धब्बे दिखाई देते हैं जो बाद में पत्तियों की शिराओं तक फैल जाते हैं जिससे पत्तियां पीली होकर गिर जाती हैं।

नियंत्रण: इस रोग की रोकथाम के लिए पौधे को अधिक पानी देने से बचाएं। पौधे में पानी देते समय पत्तियों को गीला करने से बचें एवं लक्षण दिखाई देने पर जटायु (क्लोरोथॅलोनिल 75% डब्लूपी) @ 200 ग्राम प्रति एकड़ या नोवैक्सिल (मेटालैक्सिल 8% + मैंकोजेब 64% डब्लूपी) @ 800 – 1000 ग्राम प्रति एकड़ के दर से 150 से 200 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें।

कृषि क्षेत्र एवं किसानों से सम्बंधित ऐसी ही महत्वपूर्ण जानकारियों के लिए ग्रामोफ़ोन के लेख प्रतिदिन जरूर पढ़ें। आज की जानकारी पसंद आई हो तो इसे  शेयर करना ना भूलें।

Share

गेहूँ की फसल में कटाई का उचित समय एवं सावधानियां

Appropriate time and precautions for harvesting wheat crop

गेहूँ की फसल में साधारणत: फसल पकने पर पत्तियां सूखने लगती हैं, कभी-कभी एक-दो पत्तियां हरी भी रह सकती हैं एवं बाली के नीचे का भाग सुनहरा हो जाता है। साथ ही यदि दाने को अंगूठे से दबाया जाए तो दूध नहीं निकलता तथा दानों में कड़ापन आ जाता है। इसके अतिरिक्त जब दानों में 25-30 प्रतिशत तक नमी होती है, तब फसल की कटाई की जा सकती है। 

फसल पकने के तुरंत बाद काट लेना चाहिए, क्योंकि कटाई देर से करने पर कुछ किस्मों में दाने झडने लगते है, एवं चूहों तथा चिडियों से भी नुकसान हो सकता है। कभी-कभी फसल काटने में देर करने से गेहूँ के दाने की गुणवत्ता पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है। अगर कटाई समय से न करें तो उपज में भी कमी आ सकती है, क्योंकि 5-10 प्रतिशत दानों की हानि झड़ने से, चिडियों और चूहों के खाने से तथा मौसम की खराबी से होती है।  

गेहूँ की फसल में कटाई से पहले सिंचाई बंद कर देनी चाहिए, साथ ही फसल को गिरने से बचाना भी अति आवश्यक होता है। कटाई के बाद 4-5 दिन गठ्ठर को धूप में सुखना चाहिए, क्योंकि अगर कटाई के समय दानों में मिट्टी मिल जाए तो गुणवत्ता पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है।

कृषि क्षेत्र एवं किसानों से सम्बंधित ऐसी ही महत्वपूर्ण जानकारियों के लिए ग्रामोफ़ोन के लेख प्रतिदिन जरूर पढ़ें। आज की जानकारी पसंद आई हो तो इसे शेयर करना ना भूलें।

Share

मूग आणि उडीद पिकात मॉलीब्लेडिनम तत्व आवश्यक आहे

Molybdenum element is essential in the crop of green and black gram
  • मोलिब्डेनम डाळीं पिकांच्या मुळांच्या गाठीमध्ये जिवाणूंद्वारे सहजीवन नायट्रोजन निर्धारण प्रक्रियेसाठी राइजोबियम बैक्टीरिया आवश्यक आहे.

  • मॉलीब्लेडिनम हे सूक्ष्म अन्नद्रव्य आहे जे मूग आणि उडीद पिकांना फार कमी प्रमाणात लागते.

  • परंतु खूप कमी प्रमाणात मूग आणि उडीद पिकांच्या चांगल्या वाढीसाठी हे अत्यंत आवश्यक आहे.

  • मूग आणि उडीद पिकांमध्ये नायट्रोजनच्या रासायनिक परिवर्तनामध्ये मॉलीब्लेडिनम अत्यंत महत्त्वाची भूमिका बजावते.

  • हे वनस्पतींची प्रतिकारशक्ती वाढवते, तसेच वनस्पतींमध्ये व्हिटॅमिन-सी आणि साखरेचे संश्लेषण करण्यास मदत करते.

  • मॉलीब्लेडिनमच्या कमतरतेमुळे पिकाचा विकास योग्य प्रकारे होत नाही.

  • पानांच्या कडांवर पिवळे पडणे, नवीन पाने सुकणे.सर्वसाधारणपणे मॉलिब्लाडीनमच्या कमतरतेची लक्षणे नायट्रोजनच्या कमतरतेसारखीच असतात.

Share

सावधान, नरवाई जाळणे घातक आहे?

Burning crop residue is dangerous
  • शेतकरी बंधूंनो, नरवाई जाळून जमिनीत असलेले सूक्ष्म जीव व गांडुळे जाळून नष्ट होतात त्यामुळे शेताची सुपीकता आणि जमिनीची भौतिक स्थिती आणि रासायनिक अभिक्रियांवर विपरीत परिणाम होतो. जमीन कणखर बनते, त्यामुळे जमिनीची पाणी धरून ठेवण्याची क्षमताही कमी होते.

  • नरवाई जाळणे घातक आहे हे टाळण्यासाठी शेतकरी बांधव खालील कृषी यंत्रांचा वापर करू शकतात. 

  • कम्बाईन हार्वेस्टरसह स्ट्रा रीपरचा वापर करा यामुळे कापणी तसेच पेंढा गोळा करण्यात मदत होते.

  • रीपर कम बाइंडरसह पिकाचे अवशेष मुळापासून काढून टाकते.

  • सुपर सीडर आणि हैप्पी सीडर या यंत्राने काढणी केल्यानंतर ओलावा असल्यास पेरणीही करता येते.

  • पेरणी रोपांच्या टप्प्यावर शून्य मशागत बियाणे सह खत ड्रिलने देखील करता येते.

Share

जैविक कीटनाशक मेटाराइजियम एनिसोप्ली के उपयोग से मिलेंगे कई फायदा

Uses of the biological insecticide Metarhizium anisopliae

मेटाराइजियम एनिसोप्ली एक फफूंद पर आधारित जैविक कीटनाशक है। यह मिट्टी में स्वतंत्र रूप से पाया जाता है एवं सामान्यतयः कीटों में परजीवी के रूप में पाया जाता है।

जब मेटाराइजियम एनीसोप्ली के बीजाणु लक्ष्य कीट के संपर्क में आते हैं, तो उनके आवरण से चिपक जाते हैं एवं उचित तापमान और आर्द्रता होने पर बीजाणु अंकुरित हो जाते हैं। इनकी अंकुरण नलिका कीटों के श्वसन छिद्रों (स्पायरेक्लिस), संवेदी अंगों और अन्य कोमल भागों से कीटों के शरीर में प्रवेश कर जाती है।

यह कवक कीटों के संपूर्ण शरीर में कवक जाल बनाकर कीट के शारीरिक भोजन पदार्थों को अवशोषित करके खुद की वृद्धि कर लेता है। मेटाराइजियम एनीसोप्ली 50 प्रतिशत से कम नमी पर भी बीजाणु उत्पन्न कर लेते हैं। इसके कारण यह सभी परिस्थितियों में काम करता है।

मेटाराइजियम एनीसोप्ली का प्रयोग सफेद लट (बीटल), ग्रब्स, दीमक, सुन्डियों, सेमीलूपर, कटवर्म, मिलीबग और माहू आदि के रोकथाम के लिए किया जाता है।

प्रयोग की विधि:

  • मिट्टी से प्रयोग के लिए मेटाराइजियम एनिसोप्ली की 1 किलो प्रति एकड़ के दर से लगभग 75 किलो गोबर की खाद में मिलाकर अंतिम जुताई के समय प्रयोग करना चाहिए।

  • खड़ी फसल में कीट के नियंत्रण के लिए 1 किलो प्रति एकड़ की दर से 400-500 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें। 

कृषि क्षेत्र एवं किसानों से सम्बंधित ऐसी ही महत्वपूर्ण जानकारियों के लिए ग्रामोफ़ोन के लेख प्रतिदिन जरूर पढ़ें। आज की जानकारी पसंद आई हो तो इसे  शेयर करना ना भूलें।

Share

टमाटर के फसल में फल फटने के कारण एवं बचाव के उपाय

Causes and diagnosis of fruit cracking in tomato crop

टमाटर की फसल में फलों का फटना एक भौतिक विकार होता है, और यह अक्सर परिपक्वता के समय दिखाई देता है। इस विकार में फल दो प्रकार से फटते हैं, एक लंबवत और दूसरा गोलाकार। 

टमाटर की फसल में फल का फटना मुख्यतः दो कारण से होता है, पहला कारण फसल में अनियमित सिंचाई करना जैसे जमीन ज्यादा समय तक सूखी है और अचानक से भारी सिंचाई कर दिया जाए और दूसरा कारण भूमि में बोरोन नामक तत्व की कमी होना है।

फल फटने की रोकथाम: इस समस्या के बचने के लिए फसल में समय समय पर संतुलित प्रमाण में सिंचाई करें, तथा बोरोन पोषक तत्व की पूर्ति के लिए रिच बोर (बोरोन 20%) @ 1-1.5 ग्राम प्रति लीटर पानी के दर से छिड़काव करें या रिच बोरामिन-सीए (अमीनो एसिड, बोरान, कैल्शियम) @ 2-3 मिली प्रति लीटर पानी के दर से छिड़काव करें। 

कृषि क्षेत्र एवं किसानों से सम्बंधित ऐसी ही महत्वपूर्ण जानकारियों के लिए ग्रामोफ़ोन के लेख प्रतिदिन जरूर पढ़ें। आज की जानकारी पसंद आई हो तो इसे  शेयर करना ना भूलें।

Share

तरबूज की फसल में माहू कीट के लक्षण एवं नियंत्रण के उपाय

Symptoms and control of aphids in watermelon crop

यह कीट पत्तियों को एवं कोमल टहनियों को प्रभावित करते हैं, जिसके कारण पत्तियां मुड़कर मुरझाने लगती है। पौधों का विकास रुक जाता है साथ ही कीट से मधुरस उत्सर्जन के कारण पत्तियों पर काली फफूंद का विकास होता है।

नियंत्रण: इस कीट के नियंत्रण के लिए प्रकोप दिखाई देते ही नोवासेटा (एसिटामिप्रिड 20% एसपी) @ 30 ग्राम प्रति एकड़ या मीडिया (इमिडाक्लोप्रिड 17.8% एस एल) @ 40-50 मिली प्रति एकड़ + नोवामैक्स (जिबरेलिक ऍसिड 0.001%) @ 300 मिली के दर से 150-200 लीटर पानी में छिड़काव करें। 

कृषि क्षेत्र एवं किसानों से सम्बंधित ऐसी ही महत्वपूर्ण जानकारियों के लिए ग्रामोफ़ोन के लेख प्रतिदिन जरूर पढ़ें। आज की जानकारी पसंद आई हो तो इसे  शेयर करना ना भूलें।

Share