स्वयं बनाएं जीरो एनर्जी कूल चैम्बर, जानें इसकी निर्माण विधि

Construction Method of Zero Energy Cool Chamber
  • शून्य ऊर्जा शीत गृह के निर्माण के लिए हवादार और छायादार जगह का चुनाव करना चाहिए। 

  • ईंटों को जमा कर एक आयताकार करीब 165 X 115 सेमी के चबूतरे का निर्माण किया जाता है। इस चबूतरे पर गारे की सहायता से ईंटों की दोहरी दीवार का निर्माण किया जाता है। ईंटों की दोहरी दीवार के मध्य 7-8 सेमी तक स्थान खाली रखा जाता है। दोहरी दीवार की ऊंचाई 60-65 सेमी. तक रखी जाती है। 

  • इसके पश्चात छनी हुई बजरी को जल में भिगोकर दोहरी दीवार के मध्य बने खाली स्थान में भरा जाता है। बांस, टाट या बोरी के टुकड़ों से ढक्कन का निर्माण किया जाता है। इस ढक्कन की लंबाई व चौड़ाई पूरे शीत गृह के समकक्ष रखी जाती है। 

  • पानी की टंकी को 4 से 5 फीट की ऊंचाई पर रख देते हैं जिसमें 1 पाईप को लगा दिया जाता है। पाईप को ईंटों की दोहरी दीवारों के मध्य चारो तरफ घुमाया जाता है साथ ही पाइप में 15-15 सेमी. की दूरी पर छेद कर दिए जाते हैं जिससे जल का बून्द बून्द कर के रिसाव होता है और यह पानी रेत व ईंटों को गीला रखता है।

  • फलों और सब्जियों को प्लास्टिक की टोकरी में रखकर उन्हें इस शीत गृह में रख दिया जाता है और ऊपर से ढक्कन लगा दिया जाता है।  

आपके जीवन से सम्बंधित महत्वपूर्ण ख़बरों  एवं जानकारियों के लिए रोजाना पढ़ते रहें ग्रामोफ़ोन के लेख। आज की जानकारी पसंद आई हो तो इसे शेयर करना ना भूलें।

Share

पशुओं में खुरपका एवं मुंहपका रोग को इसके लक्षणों से पहचानें

Identify foot and mouth disease in animals by its symptoms

पशुओं में होने वाला खुरपका एवं मुंहपका रोग दरअसल नंगी आँखों से न दिख पाने वाले वाइरस द्वारा होता है। आइये जानते हैं इस रोग के फैलने के क्या क्या कारण हो सकते हैं। 

रोग के फैलने के कारण:

ये रोग मुख्यतः पहले से रोग से संक्रमित जानवर के विभिन्न स्त्राव और उत्सर्जित द्रव जैसे लार, गोबर, दूध के साथ अन्य स्वस्थ सीधे संपर्क मे आने, दाना, पानी, घास, बर्तन, दूध निकालने वाले व्यक्ति के हाथों से और हवा के माध्यम से फैलता है। इस स्त्राव मे विषाणु बहुत अधिक संख्या मे होते हैं और स्वस्थ जानवर के शरीर मे मुँह और नाक के माध्यम से प्रवेश कर जाते हैं। 

रोग के लक्षण:

यह रोग होने पर पशु को तेज बुखार (104-106०F) होता है। बीमार पशु के मुँह मे मुख्यत जीभ के उपर, होठो के अंदर, मसूड़ों पर साथ ही खुरो के बीच की जगह पर छोटे छोटे छाले बन जाते हैं। फिर धीरे–धीरे ये छाले आपस में मिलकर बड़े छाले बनाते हैं। आगे चलकर ये छाले फूट जाते हैं और उनमें जख्म हो जाती है। मुँह मे छाले हो जाने की वजह से पशु जुगाली बंद कर देता है और खाना पीना छोड़ देते हैं, मुँह से निरंतर लार गिरती रहती है, साथ ही मुँह चलाने पर चाप चाप की आवाज़ भी सुनाई देती है। दुधारू पशुओं में दूध का उत्पादन 80% तक कम हो जाता है। पशु कमजोर होने लगते हैं। प्रभावित पशु स्वस्थ्य होने के उपरान्त भी महीनों तक और कई बार जीवनपर्यन्त हांफते रहता है।

आपके जीवन से सम्बंधित महत्वपूर्ण ख़बरों  एवं जानकारियों के लिए रोजाना पढ़ते रहें ग्रामोफ़ोन के लेख। आज की जानकारी पसंद आई हो तो इसे शेयर करना ना भूलें।

Share

सल्फर का फसल के लिए क्या होता है महत्व, जानें इसके लाभ

Importance of Sulfur in crops
  • सल्फर (गंधक) फसलों में प्रोटीन के प्रतिशत को बढ़ाने में सहायक होता है साथ ही साथ यह पर्णहरित लवक के निर्माण में योगदान देता है जिसके कारण पत्तियां हरी रहती हैं तथा पौधों के लिए भोजन का निर्माण हो पाता है।

  • सल्फर पौधों में नाइट्रोजन की क्षमता और उपलब्धता को बढ़ाता है।

  • दलहनी फसलों में, सल्फर के कारण हीं जड़ों में अधिक गाठों का विकास होता है। इससे जड़ों में उपस्थित राइज़ोबियम नामक जीवाणु, वायुमंडल में उपस्थित नाइट्रोजन को लेकर, फसलों को उपलब्ध कराते हैं।   

  • तम्बाकू, सब्जियों एवं चारे वाली फसलों की गुणवत्ता भी सल्फर के कारण बढ़ जाती है।

  • सल्फर का महत्वपूर्ण उपयोग तिलहन फसलों में प्रोटीन और तेल की मात्रा में वृद्धि करना है। 

  • सल्फर आलू की फसल में स्टार्च की मात्रा को बढ़ाता है।

  • सल्फर को मिट्टी का सुधारक भी कहा जाता है क्योंकि यह मिट्टी के पीएच को कम करता है।

कृषि एवं किसानों से सम्बंधित लाभकारी जानकारियों के लिए ग्रामोफ़ोन के लेख प्रतिदिन जरूर पढ़ें। इस लेख को नीचे दिए शेयर बटन से अपने मित्रों के साथ साझा करना ना भूलें।

Share

रबी पिकांमध्ये दीमक नियंत्रण

  • टेरमाइट एक बहुभुज कीटक आहे, ज्याचा अर्थ असा आहे की, ते सर्व पिकांवर आक्रमण करते, दीमक वनस्पतींच्या मुळांना बरेच नुकसान करतात. प्रादुर्भाव जास्त झाल्यावर ते स्टेमही खातात.

  • बटाटा, टोमॅटो, मिरची, वांगे, फुलकोबी, कोबी, मोहरी, मुळा, गहू इत्यादी पिके दीमतेमुळे संक्रमित होणारी प्रमुख पिके आहेत.

  • या किडीवर नियंत्रण ठेवण्यासाठी वेळेवर व्यवस्थापन आवश्यक आहे.

  • कीटकनाशकासह बीजोपचारानंतर बियाणे पेरले पाहिजे

  • कीटकनाशक मेट्राझियमने मातीचा उपचार करणे आवश्यक आहे

  • कच्च्या शेणाचे खत वापरले जाऊ नये, कारण कच्चे शेण हे या किडीचे मुख्य अन्न आहे.

  • दिमकांवर नियंत्रण ठेवण्यासाठी, क्लोरोपायरीफोस 20% ईसी 1 लिटर 4 किलो वाळू मिसळून पेरणीच्या वेळी शेतात लावावे.

Share

भिंडी की फसल में पीला शिरा मोज़ेक वायरस प्रकोप के लक्षण एवं नियंत्रण

Symptoms and control of yellow vein mosaic virus in okra crop

पीला शिरा मोज़ेक दरअसल एक वायरस यानी विषाणु जनित रोग है जो फसल में उपस्थित रसचूसक कीट के कारण से और ज्यादा फैलता है। यह भिंडी की फसल के लिए वर्तमान समय में बेहद घातक हो सकता है।  

लक्षण: इस रोग के शुरुआती अवस्था में ग्रासित पौधे की पत्तियों की शिराएँ पीली पड़ने लगती हैं और जैसे ही रोग बढ़ता जाता है वैसे वैसे पीलापन पूरी पत्ती पर फैलता जाता है और इसके परिणाम से पत्तियाँ मुड़ने एवं सिकुड़ने लगती है, पौधे की वृद्धि रुक जाती है। प्रभावित पौधे के फल हल्के पीले, विकृत और सख्त हो जाते हैं।

नियंत्रण: यह रोग मुख्यत सफेद मक्खी से फैलता है, इसके नियंत्रण के लिए नोवासेटा (एसिटामिप्रिड 20% SP) @ 30 ग्राम प्रती एकड़ या पेजर (डायफैनथीयुरॉन 50% WP) 240 ग्राम/एकड़ के दर से 150 से 200 लीटर पानी के हिसाब से छिड़काव करें।

कृषि क्षेत्र की महत्वपूर्ण जानकारियों के लिए रोजाना पढ़ते रहें ग्रामोफ़ोन के लेख। आज की जानकारी पसंद आई हो तो शेयर करना ना भूलें।

Share

आलू की फसल में मिट्टी उपचार से मिलते हैं कई फायदे

There are many benefits of soil treatment in potato crop
  • आलू की फसल में बुवाई के पहले मिट्टी उपचार बहुत आवश्यक हैं।

  • मिट्टी की उर्वरता और पोषक तत्व प्रबंधन रोग मुक्त फसल एवं अच्छी उपज के लिए बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। ये फसल की गुणवत्ता पर सीधा प्रभाव डालते हैं।

  • रबी सीजन में आलू की बुवाई के पूर्व मिट्टी में बहुत अधिक नमी होने के कारण कवक जनित रोगों एवं कीटों का बहुत अधिक प्रकोप होता है।

  • कवक जनित रोगों एवं कीटों के निवारण के लिए मिट्टी उपचार कवकनाशी एवं कीटनाशी से किया जाता है।

  • मिट्टी उपचार कवकनाशी एवं कीटनाशी से करने से आलू की फसल में कंद गलन जैसे रोग नहीं लगते है।

  • मिट्टी उपचार के द्वारा आलू में लगने वाले उकठा रोग से भी बचाव हो जाती है।

  • मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी को दूर करने के लिए भी मिट्टी उपचार बहुत आवश्यक है। इसके मुख्य पोषक तत्वों का उपयोग किया जाता है।

  • मिट्टी उपचार करने से मिट्टी की सरचना में सुधार होता है एवं उत्पादन भी काफी हद तक बढ़ जाता है।

कृषि एवं किसानों से सम्बंधित लाभकारी जानकारियों के लिए ग्रामोफ़ोन के लेख प्रतिदिन जरूर पढ़ें। इस लेख को नीचे दिए शेयर बटन से अपने मित्रों के साथ साझा करना ना भूलें।

Share

कन्सोर्टिया पीके बॅक्टेरियांचे महत्त्व

Importance of consortia PK bacteria
  • यात दोन प्रकारच्या बॅक्टेरियाचे मिश्रण आहे. फॉस्फरस सोल्युबिलीझिंग (पी.एस.बी.) आणि पोटॅश मोबिलिझिंग बॅक्टेरिया (के.एम.बी).

  • माती आणि पिकांचे दोन प्रमुख घटक असलेल्या पोटॅश आणि फॉस्फरसच्या पुरवठ्यात मदत करते, डाळींमध्ये त्याचा जास्त  वापर केला जातो.

  • हे जीवाणू जमिनीत विरघळणारे पोटॅश आणि फॉस्फरस रूपांतरित करते जे वनस्पती प्रदान करतात.

  • यामुळे वेळेवर झाडाला आवश्यक घटक मिळतात आणि पीक चांगले वाढते.

  • पिकांचे उत्पादन वाढते तसेच मातीत पोषक तत्त्वांची उपलब्धता देखील होते.

Share

पेरणीच्या 1 ते 5 दिवसांत बटाटा पिकांमध्ये तण व्यवस्थापन

Weed Management in Potato Crop 1-5 Days of Sowing
  • बटाट्याचे पीक हे मुख्य रब्बी पीक आहे, पावसाळ्यानंतर उर्वरित जमिनीत जास्त ओलावा असल्याने बटाटा पिकांची पेरणी झाल्यावर तण मोठ्या प्रमाणात वाढू लागते.

  • वेळेवर आणि योग्य तणनाशकाचा वापर करून सर्व प्रकारच्या तणांवर नियंत्रण ठेवता येते.

  • रासायनिक पध्दत: – या पद्धतीत रसायनांचा वापर करून तणनियंत्रण केले जाते. वेळोवेळी या रसायनांचा वापर करून तण खूप चांगल्या प्रकारे नियंत्रित केले जाऊ शकते.

  • पेरणीनंतर 1 ते 3 दिवसानंतर: – तणनियंत्रणाच्या रासायनिक नियंत्रणासाठी पेरणीच्या 1 ते 3 दिवसानंतर पेंडमीथेलिन 38.7% सी.एस. 700 मिली / एकरी दराने फवारणी करावी.

  • अशा प्रकारे फवारणीमुळे पेरणीच्या सुरुवातीच्या काळात उगवलेल्या तणांवर नियंत्रण ठेवता येते.

  • पेरणीनंतर दुसरी फवारणी: – मेट्रीबुझिन 70 % डब्ल्यू.पी. 100 ग्रॅम प्रति एकरी 3 ते 4 दिवसानंतर किंवा बटाटा रोप 5 सें.मी.तयार होण्यापूर्वी फवारणी करावी.

  • तणनाशकांची फवारणी करताना पुरेसा ओलावा असणे फार महत्वाचे आहे.

Share

बियाणे उपचार करणे का आवश्यक आहे?

Why seed treatment is necessary
  • शेतकरी बांधवांनो, शेतीसाठी  बियाणे उपचार करणे हे अत्यंत महत्त्वाचे असते, त्यामुळे बियाणे व मातीजन्य रोगांना प्रतिबंध होतो. 

  • देशातील 70 ते 80 टक्के शेतकरी बियाणे बदलत नाहीत आणि ते जुने बियाणेच वापरतात.

  • या कारणांमुळे कीड आणि रोगाचा धोका जास्त असतो, परिणामी खर्च देखील वाढतो.

  • बीजप्रक्रिया करून उत्पादनात 6 ते 10 टक्के एवढी वाढ करता येते.

  • बीजप्रक्रियेने उगवण चांगली होण्याबरोबरच झाडांची वाढही चांगली होते. बीजप्रक्रिया केल्याने कीटकनाशकांचा प्रभावही वाढतो आणि पीक 20 ते 25 दिवस सुरक्षित होते.

Share

शेतीत घरगुती शेण खतांंचे महत्त्व काय आहे?

Importance of cow dung in agriculture
  • शेणखतामुळे जमिनीची भौतिक रचना सुधारते आणि जमिनीत हवेची हालचाल वाढते.

  • जमिनीची पाणी धारण क्षमता वाढवून जमिनीतील पाण्याची पातळी सुधारते.

  • त्याच्या वापराने झाडांच्या मुळांचा विकास चांगला होतो आणि झाडे जास्त प्रमाणात पोषकद्रव्ये शोषून घेतात.

  • हे जमिनीतील सेंद्रिय पदार्थ वाढवण्यास मदत करते. त्याचा वापर जमिनीत सेंद्रिय कार्बनचे प्रमाण सुधारतो.

  • जमिनीची क्षार विनिमय क्षमता वाढते.

  • जमिनीत फायदेशीर जीवाणूंची संख्या वाढते, ज्यामुळे पिकाचे उत्पादन खूप चांगले होते.

  • गाईचे शेण जटिल संयुगांचे साध्या संयुगांमध्ये रूपांतर करण्यास मदत करते.

  • मातीचे कण एकत्र चिकटवून जमिनीची धूप रोखते.

  • यामध्ये नाइट्रोजन 0.5 %, फास्फोरस 0.25 % आणि पोटाश 0.5 % वापरले जाते.

Share